शिद्दत
बडी शिद्दत से घूर रहे थे
खुद को आईने मे वो
बडा प्यार आ रहा था उन्हे
चमन की नज़रो को देखकर
खुद पे इत्रा रहे थे
खुद से शर्मा रहे थे वो
बडा लुफ्त आ रहा था उन्हे
हुस्न की बहारो को देखकर
खुमार था आंखो मे
अपनी खुबसूरती मलंग देखकर
जिस्म का रंग देखकर
कभी ये अपना ढंग देखकर
कभी बाल खुल रहे थे
कभी बाल बंध रहे थे
चुडीयाँ बदल बदल
मौज़ो के रंग बदल रहे थे
पहले मुस्कुराना फिर
खुल के खिलखिलाना
जैसे खनक गया हो
पैमाने से कोई पैमाना
कभी आगे झुक रहे थे
सीने मे हाथ रखकर
कभी सिर झटक रहे थे
होठो पे हाथ रख कर
फिर डर के उनका देखना इधर-उधर
पकडी ना जाये करतूत की
खुद पे थी बद-नज़र
====================पंकज तिवारी सहज
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