Monday, August 25, 2008

आखिर बदला गाँव

आखिर बदला गाँव
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !
चलता नही हल किसान गाँव में ,दिखे न राह बटोही !!
चले न समय से पछवा पुरवैया ,पवन हुआ निर्मोही !
वर्षा ऋतू में चले लूक जैसे बदल गई है निति !!
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
किसी गाँव में मिले न मानुष करता वन रखवारी !
दिखे न गाँव में हाथी घोडे ,गाँव के मुखिया दुवारी !!
चारो तरफ़ दबंगई नेता ,आंख दिखा करते राजनीति !
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
भइया गए बम्बई कमाने ,टेलीफोन न भेजे पाती !
गांवे माई रोवे फूटी फूटी ,बात न चितवा लुभाती !!
रिश्ते की डोरी टूट गई क्या कहाँ गई दूजे की प्रीति !
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
वृक्ष काट कर हे मानुष ,करता क्यों प्रकृति लडाई !
आज है चाहत पानी की तो पछवा चले बयारी !!
मानव करते तंग प्रकृति को ,प्रकृति भुलाई मिति !
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
पंकज तिवारी "सहज" द्वारा रचित यह पाठ्य कबिता ख़ुद आपने द्वारा रचित है !
अतः इसका @सर्वाधिकार पंकज तिवारी "सहज"के पास है !

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