Monday, August 25, 2008

मम्मी-पापा

मम्मी-पापा

मेरी मम्मी सबसे अच्छी !
मुझे खूब प्यार वो करती !!
पापा मेरे और भी अच्छे !
संग मेरे वो रोज खेलते!!
सुबह -सवेरे उठ कर आते प्यार से मुझको दोनो जगाते!
मम्मी मेरी खाना बनाती !!
पापा मुझे तैयार कराते !
खुशी -खुशी मैं बस्ता लेता!!
पापा मुझको छोड़ कर आते!
स्कूल से जब मैं पढ़ कर आता!!
मम्मी से फिर मैं खाना खाता!
होम -वर्क मैं अपना करके गोदी में मम्मी के सो जाता !!
शाम को जब पापा हैं आते पार्क में मुझको खेल खिलाते !
रात को सोने से पहले मैं अगले दिन का बैग लगाता! !
तुम भी मुझ जैसे बन जाओ पापा -मम्मी के प्यारे बन जाओ!
दोनों जब मुझे प्यार हैं करते दुनिया से न्यारे हैं लगते !!
पंकज तिवारी "सहज"

आखिर बदला गाँव

आखिर बदला गाँव
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !
चलता नही हल किसान गाँव में ,दिखे न राह बटोही !!
चले न समय से पछवा पुरवैया ,पवन हुआ निर्मोही !
वर्षा ऋतू में चले लूक जैसे बदल गई है निति !!
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
किसी गाँव में मिले न मानुष करता वन रखवारी !
दिखे न गाँव में हाथी घोडे ,गाँव के मुखिया दुवारी !!
चारो तरफ़ दबंगई नेता ,आंख दिखा करते राजनीति !
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
भइया गए बम्बई कमाने ,टेलीफोन न भेजे पाती !
गांवे माई रोवे फूटी फूटी ,बात न चितवा लुभाती !!
रिश्ते की डोरी टूट गई क्या कहाँ गई दूजे की प्रीति !
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
वृक्ष काट कर हे मानुष ,करता क्यों प्रकृति लडाई !
आज है चाहत पानी की तो पछवा चले बयारी !!
मानव करते तंग प्रकृति को ,प्रकृति भुलाई मिति !
कहाँ गए स्नेह व रिश्ते ,गई कहाँ गाँव की रीति !!
पंकज तिवारी "सहज" द्वारा रचित यह पाठ्य कबिता ख़ुद आपने द्वारा रचित है !
अतः इसका @सर्वाधिकार पंकज तिवारी "सहज"के पास है !

Monday, August 18, 2008

sahaj

दोस्ती अच्छी हो तो रंग लाती ही ,दोस्ती गहरी हो तो सबको भाति है ,दोस्ती नादाँ हो तो टूट जाती है ,पर अगर दोस्ती अपने जैसी हो तो इतिहास बनाती है जान है मुझको ज़िन्दगी से प्यारी जान के लिए कर दूँ कुर्बान यारी जान के लिए तोड़ दूँ दोस्ती tumhaariAb tumse kya chhupaanaTum hi toh ho jaan hamaari Tumse doori ka ehsaas sataane lagaaTere saath guzaraa har lamha yaad aane lagaJab bhi tujhe bhoolne ki koshish ki aye dostTu dil ke aur bhi kareeb aane lagaZindagi nahin humein doston se pyaariDoston pe haazir hai jaan hamaariAankhon mein hamaari aansoon hai toh kyaJaan se bhi pyaari hai muskaan tumhaari Dosti toh sirf ek ittefaaq haiYeh toh dilon ki mulaakaat haiDosti nahi dekhti yeh din hai ki raat haiIsme toh sirf wafaadaari aur jasbaat hai Raatein gumnaam hoti haiDin kisike naam hota haiHum zindagi kuch is tarah jeete haiKi har lamha doston ke naam hota hai Aye dost teri दोस्ती uss ghadi tadpaayegiJab zindagi kahegi alvida, Aur maut bhi naa aayegi -- -- Trust God, he knows ur future। He may not reveal it to you but he will walk with you as the future unfolds। Don't trust the stars, trust the one who made them। Gud Day!।

भारत देश

भारत प्यारा देश हमारा सब देशों से न्यारागोद में इसके अनगिनत नदियाँ बहती हैंगंगा, यमुना, सरस्वती तीनों कहती हैंउनका ये मिलन कहा जाता संगम प्रयाग तीर्थ राज में बहती त्रिवेणी धारासिर पर तेरे खड़ा हिमालय कहलाता वो ताजचरणों को धोता सागर रखता माँ की लाजकेरल है हरा, कर्नाटक चंदन से भरा कश्मीर महके केसर की भीनी खुशबू से सारा नील गगन भी हँस रहा खुश होकर आज आजादी के दिवस पर सर्वत्र बज रहे साजआई शुभ घड़ी लाई, खुशियों की लड़ीगाएँ हम सब मिलकर भारत तुझ पर नाजभारत प्यारा देश हमारा।सब देशों से न्यारा।।

Thursday, August 14, 2008

स्वाधीनता दिवस

मेरे दोस्तों आप सबों को "स्वाधीनता दिवस " की बहुत बहुत मुबारकबाद ….. हम सब एक दूसरे को मुबारकबाद दे रहे हैं …. इस खूबशूरत दिन के लिए …. और शायद मुबारकबाद ही देते रह जायेगें …. और आज़ादी की बुनियादी बातों को दरकिनार करते रह जायेगें ….. कभी हमलोगों ने सोचा की आजादी क्या है ? कभी ये गौर करने की कोशिश की क्या हम वाकई आजाद हैं ? “आजादी ” …… “स्वतंत्रता दिवस ”… क्या है ये ?????????? ? क्या ये हमारे लिए एक त्यौहार की तरह है या फिर जश्न मनाने का एक खुबसूरत दिन ? या फिर उन महापुरुषों का जय जैकार करने का जिन्होंने भारत देश के लिए कुर्बानियां दी ? या फिर साल में आने वाले इस एक दिन को एक छुट्टी की तरह घर में बिता देने का ?????आजादी का मतलब ये नहीं होता की एक ज़मीन पे रहने वाले को किसी की गुलामी से आज़ाद करा देना …. आजादी का मतलब ये नहीं होता की हमें अपने पसंद के कपड़े पहनने ,खाने और अपने पसंद के कारोबार करने की आजादी मिल जाए …………॥ क्या है ये ????? आज़ादी नाम है सोच की आजादी का ….. जब तक हमारी सोच किसी और की गुलाम रहेगी तब तक हम हरगिज ख़ुद को आज़ाद नहीं तस्लीम कर सकतें …. जब तक इंसान की सोच आज़ाद नही होगी वह हमेशा अपने वाहियात सोचों के जंजीरों में जकडा हुआ ख़ुद को आज़ाद समझने की भूल कर आज़ादी की तौहीन करता रहेगा …… हमने जिन लोगों से आज़ादी छिनी … उसके ज़हर को हम आज भी ख़ुद से लगाये बैठे हैं … वह ज़ख्म जिसे अपने सिने पर आज़ादी के वक्त खाई थी वह ज़ख्म को हम आज तक अपने कन्धों पर थामे थामे नासूर बना चुके हैं …। आज भी हम उन वाहियात और घिनौने विचारों के गुलाम हैं जिसने हमारी आज़ादी के चेहरे पर हमेशा कालिख पोती है …. और उसी कालिख लगे चेहरे पर हम तिरंगा लहरा कर आज़ादी के खूबसूरत गीत गा रहें हैं ….आख़िर इन घिनौने विचारों से हमें आज़ादी कौन दिलाएगा …?? जिसने किसी माँ के कोख को हमेशा के लिए सुना कर दिया ??…. जिसने किसी बाप के आंखों को पत्थर बना दिया ??…॥ जिसने एक बहिन से उसके भाई को छीन लिया ??.. जिसने एक भाई के बहिन के आबरू को तार -तार कर दिया ??…. जिसने हमारे देश को दुनिया के सामने शर्मसार कर दिया ??…. जिसने इस देश के सीने में धड़कते मासूम दिल को डर और खौफ की सौगात दिए ?? .. नहीं मेरे दोस्तों नही …. ये सारे शैतान जो ऐसा करते हैं …. वह हमें कुछ नही दे सकते सिर्फ़ और सिर्फ़ हमें तबाह और बर्बाद कर सकते हैं …. और अगर हम इनके साए में डर कर जीने की मज़बूरी जैसे घटिया विचारों को हवा दी …. तो हमारा सही वजूद भी बाकी न रहेगा ….तो मेरे दोस्तों हमें अपने सोच को आजाद कराने कोई नही आएगा … अगर कोई आएगा तो वह खूबशूरत और मजबूत इंसान जो हमारे अन्दर ही कहीं न कही बैठा सिसक रहा है …। और जो बेबस और लाचार हमें धिक्कार रहा है ……… तो मेरे दोस्तों उस खूबशूरत इंसान का गला क्यों घोट रहें हैं हम ?? …आज इस सुनहरे मौके पर हम सब एक दूसरे से ये वादा करें की वह खूबशूरत इंसान जो हमारे अन्दर बैठा हुआ है उसे बाहर लायेगें उसे सिसक सिसक कर नही मरने देगें ….वह इंसान अगर बहार आया तो साड़ी वाहियात सोचें और फरेब को हमेशा के लिए ख़त्म कर देगा …….. तब हम आजाद होंगे और !! और !! पूरी दुनिया हमारी आजाद सोच के क़दमों में होगी …….. तब हम गर्व से कह सकेगें ……….हम आजाद है और हमारा भारत देश महान है ….जो मैंने नीचे चार लाइन लिखी है यह हमारे सारे नौजवान दोस्तों के लिए है जिन पर हमारी गुलाम सोचों को आजाद करने की जिम्मेदारी है ….न देखो हमे गर्द -व -गुबार के आईने में हम रौशन दिए है , अंधेरो का निशाँ तक मिटा जायेगें, लोग कहते हैं हम में ख़ुद को बदलने का हौसला नहीं , बाक़ी पर जूनून है कायम हम में , एक आसमान इस ज़मीन पे बिछा जायेगें एहसास आपके मुहब्बत के इंतजार में************************************************************************* आपका दोस्त पंकज तिवारी "सहज "

स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर अपने नवजवान भाइयो के नाम संदेश

निःसंदेह स्वाधीनता के 60 वर्ष के पश्चात भी यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज भी भारत में राष्ट्र क्या है, इसकी परिकल्पना क्या है, यह एक दिशाहीन बहस बन चुकी है। जबकि देश कैसे बनता है, इसे कौन बनाता है, यह अपने आप में सुस्पष्ट है, सुपरिभाषित है। देश को समझना है तो सर्वप्रथम उसकी लघुत्तम इकाई को समझना उचित होगा। यह इकाई होती है घर या परिवार
एक घर या उस घर में रहने वाला परिवार किस प्रकार बनता है? उत्तर है घर या परिवार के लिए चाहिए एक निश्चित चहारदीवारी से घिरा भू-भाग। फिर उस घर में रहने वाले सदस्यों के बीच रागात्मक एवं आत्मीय संबंध, उस घर-परिवार की अपनी परंपराएँ, संस्कार एवं संस्कृति और समान मित्र एवं समान शत्रु। ये लक्षण अगर एक घर या परिवार में हैं, तो हम उसे एक आदर्श परिवार या आदर्श घर कहते हैं। ठीक यही तथ्य या लक्षण देश पर लागू होते हैं
कारण देश कोई जमीन का टुकड़ा भर नहीं है। अगर ऐसा होता तो न केवल कभी शक्ति-संपन्न सोवियत संघ का बिखराव होता और न ही कभी दुनियाभर में बिखरे यहूदी इसराइल को विश्व के मानचित्र में स्थापित कर पाते। भारत में भी राष्ट्र की परिकल्पना एक अत्यंत प्राचीन परिकल्पना है। गंगोत्री से जल लेकर रामेश्वरम पर अभिषेक करना एवं चारों धामों की यात्रा करने का संस्कार आसेतु हिमाचल देश को एक सूत्र में बाँधने की ही परिकल्पना है।
निःसंदेह स्वाधीनता के 60 वर्ष के पश्चात भी यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज भी भारत में राष्ट्र क्या है, इसकी परिकल्पना क्या है, यह एक दिशाहीन बहस बन चुकी है। जबकि देश कैसे बनता है, इसे कौन बनाता है, यह अपने आप में सुस्पष्ट है, सुपरिभाषित है।
यह कहना गलत होगा कि स्वाधीनता के पश्चात या अँगरेजों की देन से भारत एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। यह इतिहास के प्रति हमारी अज्ञानता का एवं स्व के प्रति विस्मरण का सूचक है।
देश बनता है उसकी संस्कृति से, उसकी परंपराओं से, वहाँ के निवासियों के मन में देश के प्रति असंदिग्ध निष्ठा से। इसीलिए विविध संस्कृतियों को समाहित करने वाला अमेरिका देश भी नागरिकता देने से पहले अपने निवासियों से एक लिखित परीक्षा में राष्ट्रप्रेम संबंधी सवाल पूछता है। अमेरिका के पूर्वजों से, अमेरिका को स्थापित करने वालों से आपके संबंध अगर रागात्मक हैं तो ही अमेरिका में आपके लिए स्थान है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता के साढ़े पाँच दशक से भी अधिक समय व्यतीत होने के बाद भी 'भारत' आज 'इंडिया' है। संज्ञा का अनुवाद, नाम का अनुवाद अपने आप में एक दुर्भाग्यपूर्ण पीड़ादायक उदाहरण है। यह पीड़ा इशारा करती है कि देश में, देश के अंदर देश से विलग ताकतें न केवल सक्रिय हैं, अपितु खाद-पानी पा रही हैं। इसी के चलते 1929 में रावी के तट पर आजादी का संकल्प लेने के बाद 1947 में रावी हमारे पास नहीं है। कश्मीर जल रहा है। पूर्वांचल में मिशनरी ताकतें फल-फूल रही हैं। पंजाब-हरियाणा के बीच पानी में आग है।
यह परिदृश्य बदलना आज समय की पहली माँग है। इसके लिए आवश्यक है राष्ट्रीयता से ओतप्रोत ताकतें एक मंच पर निहित स्वार्थों को दूर करें और एक समृद्धशाली भारत की रचना करें, जिसका उसमें सामर्थ्य है।
NDनिःसंदेह स्वाधीनता के 60 वर्ष के पश्चात भी यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज भी भारत में राष्ट्र क्या है, इसकी परिकल्पना क्या है, यह एक दिशाहीन बहस बन चुकी है। जबकि देश कैसे बनता है, इसे कौन बनाता है, यह अपने आप में सुस्पष्ट है, सुपरिभाषित है। देश को समझना है तो सर्वप्रथम उसकी लघुत्तम इकाई को समझना उचित होगा। यह इकाई है घर या परिवार।एक घर या उस घर में रहने वाला परिवार किस प्रकार बनता है? उत्तर है घर या परिवार के लिए चाहिए एक निश्चित चहारदीवारी से घिरा भू-भाग। फिर उस घर में रहने वाले सदस्यों के बीच रागात्मक एवं आत्मीय संबंध, उस घर-परिवार की अपनी परंपराएँ, संस्कार एवं संस्कृति और समान मित्र एवं समान शत्रु। ये लक्षण अगर एक घर या परिवार में हैं, तो हम उसे एक आदर्श परिवार या आदर्श घर कहते हैं। ठीक यही तथ्य या लक्षण देश पर लागू होते हैं।कारण देश कोई जमीन का टुकड़ा भर नहीं है। अगर ऐसा होता तो न केवल कभी शक्ति-संपन्न सोवियत संघ का बिखराव होता और न ही कभी दुनियाभर में बिखरे यहूदी इसराइल को विश्व के मानचित्र में स्थापित कर पाते। भारत में भी राष्ट्र की परिकल्पना एक अत्यंत प्राचीन परिकल्पना है। गंगोत्री से जल लेकर रामेश्वरम पर अभिषेक करना एवं चारों धामों की यात्रा करने का संस्कार आसेतु हिमाचल देश को एक सूत्र में बाँधने की ही परिकल्पना है।
निःसंदेह स्वाधीनता के 60 वर्ष के पश्चात भी यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आज भी भारत में राष्ट्र क्या है, इसकी परिकल्पना क्या है, यह एक दिशाहीन बहस बन चुकी है। जबकि देश कैसे बनता है, इसे कौन बनाता है, यह अपने आप में सुस्पष्ट है, सुपरिभाषित है।
यह कहना गलत होगा कि स्वाधीनता के पश्चात या अँगरेजों की देन से भारत एक राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। यह इतिहास के प्रति हमारी अज्ञानता का एवं स्व के प्रति विस्मरण का सूचक है। देश बनता है उसकी संस्कृति से, उसकी परंपराओं से, वहाँ के निवासियों के मन में देश के प्रति असंदिग्ध निष्ठा से। इसीलिए विविध संस्कृतियों को समाहित करने वाला अमेरिका देश भी नागरिकता देने से पहले अपने निवासियों से एक लिखित परीक्षा में राष्ट्रप्रेम संबंधी सवाल पूछता है। अमेरिका के पूर्वजों से, अमेरिका को स्थापित करने वालों से आपके संबंध अगर रागात्मक हैं तो ही अमेरिका में आपके लिए स्थान है। यह देश का दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता के साढ़े पाँच दशक से भी अधिक समय व्यतीत होने के बाद भी 'भारत' आज 'इंडिया' है। संज्ञा का अनुवाद, नाम का अनुवाद अपने आप में एक दुर्भाग्यपूर्ण पीड़ादायक उदाहरण है। यह पीड़ा इशारा करती है कि देश में, देश के अंदर देश से विलग ताकतें न केवल सक्रिय हैं, अपितु खाद-पानी पा रही हैं। इसी के चलते 1929 में रावी के तट पर आजादी का संकल्प लेने के बाद 1947 में रावी हमारे पास नहीं है। कश्मीर जल रहा है। पूर्वांचल में मिशनरी ताकतें फल-फूल रही हैं। पंजाब-हरियाणा के बीच पानी में आग है। यह परिदृश्य बदलना आज समय की पहली माँग है। इसके लिए आवश्यक है राष्ट्रीयता से ओतप्रोत ताकतें एक मंच पर निहित स्वार्थों को दूर करें और एक समृद्धशाली भारत की रचना करें, जिसका उसमें सामर्थ्य है। यही शुभकामना, यही संकल्प!

! इसी संकल्प के साथ हम सारे नवजवान अपने भारत देश को आजाद कराएँगे और घुसपैठियों को मर भगायेंगे
जय जवान जय किसान जय विज्ञानं
आपका अपना
पंकज तिवारी सहज









जय विज्ञानं

Tuesday, August 12, 2008

शिद्दत

शिद्दत


बडी शिद्दत से घूर रहे थे
खुद को आईने मे वो
बडा प्यार आ रहा था उन्हे
चमन की नज़रो को देखकर
खुद पे इत्रा रहे थे
खुद से शर्मा रहे थे वो
बडा लुफ्त आ रहा था उन्हे
हुस्न की बहारो को देखकर
खुमार था आंखो मे
अपनी खुबसूरती मलंग देखकर
जिस्म का रंग देखकर
कभी ये अपना ढंग देखकर
कभी बाल खुल रहे थे
कभी बाल बंध रहे थे
चुडीयाँ बदल बदल
मौज़ो के रंग बदल रहे थे
पहले मुस्कुराना फिर
खुल के खिलखिलाना
जैसे खनक गया हो
पैमाने से कोई पैमाना
कभी आगे झुक रहे थे
सीने मे हाथ रखकर
कभी सिर झटक रहे थे
होठो पे हाथ रख कर
फिर डर के उनका देखना इधर-उधर
पकडी ना जाये करतूत की
खुद पे थी बद-नज़र

====================पंकज तिवारी सहज

बिता हुआ लम्हा

कुछ बीते हुए लम्हों से मुलाकात हुई, कुछ टूटे हुए सपनो से बात हुई, याद जो करने बैठे उन तमाम यादो को तो आपकी ही यादो से शुरुआत हुई ,
हमारे ज़ख्मो की वजह भी वो है ,हमारे ज़ख्मो की दवा भी वो है ,वो नमक ज़ख्मो पे लगाये भी तो क्या हुआ ,मोहब्बत करने की वजह भी वो है ,
कुछ बीते हुए लम्हों से मुलाकात कुछ टूटे हुए सपनो से बात हुई याद जो करने बैठे उन तमाम यादो को तो आपकी ही यादो से शुरुआत हुई

आप सभी पढ़ने वालो का हार्दिक अभिनन्दन
पंकज तिवारी "सहज"

दोस्ती

दोस्ती अच्छी हो तो रंग लाती है दोस्ती गहरी हो तो सबको भाति है दोस्ती नादान हो तो टूट जाती है पर अगर दोस्ती अपने जैसी हो तो इतिहास बनाती है जान है मुझको जिंदगी से प्यारी जान के लिए कर दूँ कुर्बान यारी जान के लिए तोड़ दू दोस्ती तुम्हारी अब तुमसे क्या छुपाना तुम ही तो हो जान हमारी तुमसे दूरी का एहसास सताने लगा तेरे साथ गुज़रा हर लम्हा याद आने लगा जब भी तुझे भूलने की कोशिश की ए दोस्त तू दिल के और भी करीब आने लगा जिंदगी नहीं हमे दोस्तों से प्यारी दोस्तों पे हाज़िर है जान हमारी आंखों में हमारी आँसू है तो क्या जान से भी प्यारी है मुस्कान तुम्हारी दोस्ती तो सिर्फ़ एक इत्तेफाक है यह तो दिलों की मुलाक़ात है दोस्ती नही देखती यह दिन है की रात है इसमे तो सिर्फ़ वफादारी और जज्बात है रातें गुमनाम होती है दिन किसीके नाम होता है हम जिंदगी कुछ इस तरह जीते है की हर लम्हा दोस्तों के नाम होता है ए दोस्त तेरी दोस्ती उस घड़ी तर्पायेगी जब जिंदगी कहेगी अलविदा , और मौत भी ना आएगी -- -- Trust God, he knows ur future। He may not reveal it to you but he will walk with you as the future unfolds। Don't trust the stars, trust the one who made them।



आपका अपना

पंकज तिवारी "सहज"



आप सब पढ़ने वालो को बहुत बहुत धन्यवाद

Independence Day

सलाम ….

Mere doston aap sabon ko "Independence Day" ki bahut bahut Mubaraq baad….. Hum sab ek dusre ko mubarak baad de rahe hain …. Is khubshurat din ke liye …. Aur shayad mubarakbad hi dete reh jayegen…. Aur Azadi ki buniyadi baaton ko darkinar karte rah jayegen….. Kabhi humlogon ne socha ki Azaadi kya hai?? Kabhi ye gaur karne ki koshish ki kya ham वाक्य Aazaad hain?? “Azaadi” … “Independence Day”… “Svatantrta Divas”… kya hai ye?????????? ? Kya ye hamare liye ek Festival ki tarah hai ya phir jeshn manane ka ek khubshurat din? Ya phir Un Mahpurushon ka jai jai kar karne ka jinhone BHARAT Desh ke liye qurbaniyan din.? Ya phir Saal me aane wale is ek din ko ek chhutti ke tarah ghar me bita dene ka????

Azaadi ka matab ye nahin hota ki ek zameen pe rahne wale ko kisi ki ghulami se Azaad kara dena…. Azaadi ka matalb ye nahin hota ki hame apne pashand ke kapde,khane aur apne pashand ke karobar karne ki azaadi mil jaye …

Aazzzzzzzzzaaaadddi ii……….. kya hai ye????? Aazaadi naam hai soch ki Azaadi ka ….. Jab tak hamari soch kisi aur ki ghulam rahegi ham hargij khud ko Azaad nahin taslim kar sakten…. jab tak insaan ki soch Aazaad naihn hogi wah hamesha apne wahiyat sochon ke zanzeeron me jakda huwa khud ko Aazaad samajhne ki bhul kar Aazaadi ki touhin karta rahega …… Hamne jin logon Azadi Chhini… uske zehar ko hum aaj bhi khud se lagaye baithe hain … wah zekhm jise apne sine par Aazaadi ke waqt khaee thi wah zekhm ko hum aaj tak apne kandhon pe dhote dhote Naashur bana chuke hain …. Aaj bhi hum un waahiyat aur ghinoune vicharon ke ghulam hain jisne Hamari Azadi ke chehre par hamesha Kaalikh poti hai…. Aur usi kaalikh lage chehre par hum Tiranga Lehra kar Azadi ke khoobsurat geet ga rahen hain ….

Aakhir in ghinaune vicharon se hame azadi koun dilayega …?? jisne kisi Maa ke kokh ko hamesha ke liye suna kar diya??…. Jisne kisi baap ke aankhon ko patthar bana diya??….. jisne ek behan se uske bhaee ko chhin liya??.. jisne ek bhaee ke behan ke aabru ko taar-taar kar diya??…. Jisne hamare desh ko duniya ke saamne sharmsar kar diya ??…. Jisne is desh ke sine me dhadakte maasum dil ko darr aur khouf ki sougat diye?? .. nahin mere doston nahin…. Ye saare Shaitaan jo aisa karte hain …. wah hame kuchh nahin de sakte sirf aur sirf hame tabaah aur barbad kar sakte hain …. Aur agar hum inke saaye me darr kar jine ki mazburi jaise ghatiya vicharon ko hawa di …. To Hamara sahi wazud bhi baaki na rahega….

To mere doston Hame apne soch ko azad karane koi nahin aayega… agar koi aayega to wah khubshurat aur majbut insaan jo hamare andar hi kahin na khain baitha sisak raha hai…. Aur jo bebas aur laachaar hame dhikkar raha hai ……… To mere doston us khubshurat insaan ka gala kyon ghot rahen hain ham?? …

Aaaj is mouke par HUM sab ek dusre se ye wada Karen ki wah khubshurat insaan jo hamare andar baitha huwa hai use bahar layegen use sisak sisak kar nahin marne degen ….wah insaan jo agar bahar aaya to saari vahiyat sochen aur Fareb ko hamesha ke liye khatm kar dega …….. Tab Hum azad honge aur!! aur!! puri duniya hamari azad soch ke kadmon me hogi …….. Tab ham Garv se keh sakegen……….


HUM AaZaAD HAIN
HUM AaZaAD HAIN
AUR
HAMARA BHARAT MAHAN ….


jo maine niche ye chaar line likhi hai yeh hum saare noujawan doston ke liye hai jin par Humari Ghulam sochon ko Azad karne ki jimmedari hai ….



Na dekho HUME gard-va-ghubaar ke aaeene men
HUM roushan diye hain, andheron ka nishaan tak mita jayegen
Log kehte hain Hum me khud ko badalne ka housla nahin baaqi
Par junun hai qayam Hum me, ik aasmaan is zameen pe bichha jayegen
EHSAAS



आपके मुहब्बत AUR QULUSH KE INTEJAAR ME
आपका दोस्त

पंकज तिवारी सहज

Saturday, August 9, 2008

बढ़ती महँगाई

बढ़ती महँगाई
10 मई- 7.82 फ़ीसदी
17 मई- 8.10 फ़ीसदी
24 मई- 8.24 फ़ीसदी
31 मई- 8.75 फ़ीसदी
7 जून- 11.05 फ़ीसदी
14 जून- 11.42 फ़ीसदी
21 जून- 11.63 फ़ीसदी
28 जून- 11.89 फ़ीसदी

महगाई

सरकार ने पिछले महीने की चार तारीख़ को पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाए थे, जिसके बाद महँगाई की दर सात जून को समाप्त हुए सप्ताह में 13 वर्ष के बाद पहली बार 11 फ़ीसदी तक पहुँच गई थी.
महँगाई को काबू में करने के लिए रिज़र्व बैंक ने पिछले महीने रेपो दर और नगद सुरक्षित अनुपात (सीआरआर) में वृद्धि की थी.------------------------पंकज तिवारी सहज