Monday, March 30, 2009

माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री


॥ सिद्धिदात्री ॥
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात्‌ सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
माँ
दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार
हैं
1-अणिमा 2। लघिमा 3. प्राप्ति 4. प्राकाम्य 5. महिमा 6. ईशित्व,वाशित्व 7. सर्वकामावसायिता 8. सर्वज्ञत्व 9. दूरश्रवण 10. परकायप्रवेशन 11. वाक्‌सिद्धि 12. कल्पवृक्षत्व 13. सृष्टि 14. संहारकरणसामर्थ्य 15. अमरत्व 16. सर्वन्यायकत्व 17. भावना 18. सिद्धि


नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। सिद्धिदात्री माँ की उपासना से भक्तों की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।
माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए। माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती।माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करनी चाहिए। माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है।इनकी आराधना से जातक को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। आज के युग में इतना कठिन तप तो कोई नहीं कर सकता लेकिन अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर कुछ तो माँ की कृपा का पात्र बनता ही है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करना चाहिए।या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।
----------पंकज तिवारी सहज

Thursday, March 26, 2009

शिव के कुछ पर्यायवाची नाम

वेदों, पुराणों और उपनिषदों में अनेक नामों से शिव की महिमा गाई गई है। उनमें से कुछ नाम यहाँ उद्धृत किए जा रहे हैं :
रुद्र, शिव, अंगीरागुरु, अंतक, अंडधर, अंबरीश, अकंप, अक्षतवीर्य, अक्षमाली, अघोर, अचलेश्वर, अजातारि, अज्ञेय, अतीन्द्रिय, अत्रि, अनघ, अनिरुद्ध, अनेकलोचन, अपानिधि, अभिराम, अभीरु, अभदन, अमृतेश्वर, अमोघ, अरिदम, अरिष्टनेमि, अर्धेश्वर, अर्धनारीश्वर, अर्हत, अष्टमूर्ति, अस्थिमाली, आत्रेय, आशुतोष, इंदुभूषण, इंदुशेखर, इकंग, ईशान, ईश्वर, उन्मत्तवेष, उमाकांत, उमानाथ, उमेश, उमापति, उरगभूषण, ऊर्ध्वरेता, ऋतुध्वज, एकनयन, एकपाद, एकलिंग, एकाक्ष, कपालपाणि, कमंडलुधर, कलाधर, कल्पवृक्ष, कामरिपु, कामारि, कामेश्वर, कालकंठ, कालभैरव, काशीनाथ, कृत्तिवासा, केदारनाथ, कैलाशनाथ, क्रतुध्वसी, क्षमाचार, गंगाधर, गणनाथ, गणेश्वर, गरलधर, गिरिजापति, गिरीश, गोनर्द, चंद्रेश्वर, चंद्रमौलि, चीरवासा, जगदीश, जटाधर, जटाशंकर, जमदग्नि, ज्योतिर्मय, तरस्वी, तारकेश्वर, तीव्रानंद, त्रिचक्षु, त्रिधामा, त्रिपुरारि, त्रियंबक, त्रिलोकेश, त्र्यंबक, दक्षारि, नंदिकेश्वर, नंदीश्वर, नटराज, नटेश्वर, नागभूषण, निरंजन, नीलकंठ, नीरज, परमेश्वर, पूर्णेश्वर, पिनाकपाणि, पिंगलाक्ष, पुरंदर, पशुपतिनाथ, प्रथमेश्वर, प्रभाकर, प्रलयंकर, भोलेनाथ, बैजनाथ, भगाली, भद्र, भस्मशायी, भालचंद्र, भुवनेश, भूतनाथ, भूतमहेश्वर, भोलानाथ, मंगलेश, महाकांत, महाकाल, महादेव, महारुद्र, महार्णव, महालिंग, महेश, महेश्वर, मृत्युंजय, यजंत, योगेश्वर, लोहिताश्व, विधेश, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, विषकंठ, विषपायी, वृषकेतु, वैद्यनाथ, शशांक, शेखर, शशिधर, शारंगपाणि, शिवशंभु, सतीश, सर्वलोकेश्वर, सर्वेश्वर, सहस्रभुज, साँब, सारंग, सिद्धनाथ, सिद्धीश्वर, सुदर्शन, सुरर्षभ, सुरेश, सोम, सृत्वा, हर-हर महादेव, हरिशर, हिरण्य, हुत आदि।
---------------------------------------------------------------------------पंकज तिवारी सहज

सुंदरकाण्डमंगलाचरण

पंचम सोपान-मंगलाचरणश्लोक :
* शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदंब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌।रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिंवन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥1॥
भावार्थ:-शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, माया से मनुष्य रूप में दिखने वाले, समस्त पापों को हरने वाले, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ॥1॥
* नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीयेसत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मेकामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥
भावार्थ:-हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके अंतरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिए॥2॥
* अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहंदनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌।सकलगुणनिधानं वानराणामधीशंरघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥
भावार्थ:-अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥3॥

श्रीमद्भागवद्गीता का महत्त्व

कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बच्चों को अर्थ और भाव के साथ श्रीगीताजी का अध्ययन कराएँ। स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए भगवान की आज्ञानुसार साधन करने में समर्थ हो जाएँ क्योंकि अतिदुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी दु:खमूलक क्षणभंगुर भोगों के भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है।
गीताजी का पाठ आरंभ करने से पूर्व निम्न श्लोक को भावार्थ सहित पढ़कर
श्रीहरिविष्णु का ध्यान करें:----------------------------------------------------------------अथ ध्यानम्शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भावार्थ : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।


यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।
भावार्थ : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।

-----------------------------------------------पंकज तिवारी सहज

Wednesday, January 14, 2009

कृष्ण भक्ति शाखा

कृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों की रचनाओं की एक धर्म और संस्कृति के इतिहास में कृष्ण सदैव एक अद्भुत व विलक्षण व्यक्तित्व माने जाते रहें है हमारी प्राचीन ग्रंथों में यत्र - तत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है जिससे उनके जीवन के विभिन्न रूपों का पता चलता हैयदि वैदिक व संस्कृत साहित्य के आधार पर देखा जाए तो कृष्ण के तीन रूप सामने आते है - १। बाल व किशोर रूप, २. क्षत्रिय नरेश, ३. ऋष अवतारी पुरूष हैं गीता, महाभारत व विविध पुराणों में उन्ही के इन विविध रूपों के दर्शन होतें हैं कृष्ण महाभारत काल में ही अपने समाज में पूजनीय माने जाते थे वे समय समय पर सलाह देकर धर्म और राजनीति का समान रूप से संचालन करते थे लोगों में उनके प्रति श्रद्या और आस्था का भाव था राम और कृष्ण की उपासना समाज में अवतारवाद की भावना के फलस्वरूप राम और कृष्ण दोनों के ही रूपों का पूजन किया गया दोनों के ही पूर्ण ब्रह्म का प्रतीक मानकर, आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया किंतु जहाँ राम मर्यादा पुरषोत्तम के रूप में सामने आते हैं, बही कृष्ण एक सामान्य परिवार में जन्म लेकर सामंती अत्याचारों का विरोध करते हैं वे जीवन में अधिकार और कर्तव्य के सुंदर मेल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं वे जिस तन्मयता से गोपियों के साथ रास रचाते हैं , उसी तत्परता से राजनीति का संचालन करते हैं या फ़िर महाभारत के युद्ध भूमि में गीता उपदेश देते हैं इस प्रकार से राम व कृष्ण ने अपनी अपनी चारित्रिक विशेषताओं द्वारा भक्तों के मानस को आंदोलित किया राधा-कृष्ण की लीलाएं कृष्णा - भक्ति काव्य धारा के कवियों ने अपनी कविताओं में राधा - कृष्णा की लीलाओं को प्रमुख विषय बनाया श्रीमदभागवत में कृष्ण के लोकरंजक रूप को प्रस्तुत किया गया था भागवत के कृष्ण स्वंय गोपियों से निर्लिप्त रहते हैं गोपियाँ बार - बार प्रार्थना करती है , तभी वे प्रकट होतें हैं जबकि हिन्दी कवियों के कान्हा एक रसिक छैला बनकर गोपियों का दिल जीत लेते है सूरदास जी ने राधा - कृष्ण के अनेक प्रसंगों का चित्रण ककर उन्हें एक सजीव व्यक्तित्व प्रदान किया है हिन्दी कवियों ने कृष्ण ले चरित्र को नाना रूप रंग प्रदान किये हैं , जो काफी लीलामयी व मधुर जान पड़ते हैं वात्सल्य रस का चित्रण पुष्टिमार्ग प्रारंभ हुया तो बाल कृष्ण की उपासना का ही चलन था अत : कवियों ने कृष्ण के बाल रूप को पहले पहले चित्रित किया यदि वात्सल्य रस का नाम लें तो सबसे पहले सूरदास का नाम आता है, जिन्हें आप इस विषय का विशेषज्ञ कह सकते हैं उन्होंने कान्हा के बचपन की सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियाँ भी ऐसी चित्रित की है, मानो वे स्वयं वहाँ उपस्थित हों मैया कबहूँ बढेगी चोटि ?किनी बार मोहिं ढूध पियत भई , यह अजहूँ है छोटी सूर का वात्सल्य केवल वर्णन मात्र नहीं है जिन जिन स्थानों पर वात्सल्य भाव प्रकट हो सकता था , उन सब घटनाओं को आधार बनाकर काव्य रचना की गयी है माँ यशोदा अपने शिशु को पालने में सुला रही हैं और निंदिया से विनती करती है की वह जल्दी से उनके लाल की अंखियों में आ जाए जसोदा हरी पालनै झुलावै हलरावै दुलराय मल्हरावै जोई सोई कछु गावै मेरे लाल कौ आउ निंदरिया, काहै मात्र आनि सुलावै तू काहे न बेगहि आवे, तो का कान्ह बुलावें कृष्णा का शैशव रूप घटने लगता है तो माँ की अभिलाषाएं भी बढ़ने लगती हैं उसे लगता है की कब उसका शिशु उसका शिशु उसका आँचल पकड़कर डोलेगा कब, उसे माँ और अपने पिता को पिता कहके पुकारेगा , वह लिखते है - जसुमति मन अभिलाष करै,कब मेरो लाल घुतरुवनी रेंगै, कब घरनी पग द्वैक भरे,कब वन्दहिं बाबा बोलौ, कब जननी काही मोहि ररै ,रब घौं तनक-तनक कछु खैहे, अपने कर सों मुखहिं भरे कब हसि बात कहेगौ मौ सौं, जा छवि तै दुख दूरि हरैसूरदास ने वात्सल्य में संयोग पक्ष के साथ - साथ वियोग का भी सुंदर वर्णन किया है जब कंस का बुलावा लेकर अक्रूर आते हैं तो कृष्ण व बलराम को मथुरा जाना पङता है इस अवसर पर सूरदास ने वियोग का मर्म्स्पर्सी चित्र प्रस्तुत किया है यशोदा बार बार विनती करती हैं कि कोई उनके गोपाल को जाने से रोक ले जसोदा बार बार यों भारवैहै ब्रज में हितू हमारौ, चलत गोपालहिं राखैजब उधौ कान्हा का संदेश लेकर आते हैं, तो माँ यशोदा का हृदय अपने पुत्र के वियोग में रो देता है, वह देवकी को संदेश भिजवाती हैं संदेस देवकी सों कहियो।हों तो धाय तिहारे सुत की कृपा करत ही रहियोउबटन तेल तातो जल देखत ही भजि जाने जोई-चोर मांगत सोइ-सोइ देती करम-करम कर न्हाते तुम तो टेक जानतिही धै है ताऊ मोहि कहि आवै प्रात: उठत मेरे लाड लडैतहि माखन रोटी भावै श्रृंगार का वर्णनकृष्ण भक्त कवियों ने कृष्ण व गोपियों के प्रेम वर्णन के रूप में पूरी स्वछंदता से श्रृंगार रस का वर्णन किया है कृष्ण व गोपियों का प्रेम धीरे - धीरे विकसित होता है कृष्ण , राधा व गोपियों के बीच अक्सर छेड़छाड़ चलती रहती है - तुम पै कौन दुहावै गैया इत चितवन उन धार चलावत, यहै सिखायो मैया सूर कहा ए हमको जातै छाछहि बेचनहारि कवि विद्यापति ने कृष्ण के भक्त-वत्सल रूप को छोड़ कर शृंगारिक नायक वाला रूप ही चित्रित किया है विद्यापति की राधा भी एक प्रवीण नायिका की तरह कहीं मुग्धा बनाती है , तो कभी कहीं अभिसारिका विद्यापति के राधा - कृष्ण यौवनावस्था में ही मिलते है और उनमे प्यार पनपने लगता है प्रेमी नायक , प्रेमिका को पहली बार देखता है तो रमनी की रूप पर मुग्ध हो जाता है सजनी भलकाए पेखन न मेल मेघ-माल सयं तड़ित लता जनि हिरदय सेक्ष दई गेल हे सखी ! मैं तो अच्छी तरह उस सुन्दरी को देख नही सका क्योंकि जिस प्रकार बादलों की पंक्ति में एका एअक बिजली चमक कर चिप जाती है उसी प्रकार प्रिया के सुंदर शरीर की चमक मेरे ह्रदय में भाले की तरह उतर गयी और मै उसकी पीडा झेल रहा हूँ विद्यापति की राधा अभिसार के लिए निकलती है तो सौंप पाँव में लिप्त जाता है वह इसमे भी अपना भला मानती है , कम से कम पाँव में पड़े नूपुरों की आवाज़ तो बंद हो गयी इसी प्राकार विद्यापति वियोग में भी वर्णन करते हैं कृष्ण के विरह में राधा की आकुलता , विवशता , दैन्य व निराशा आदि का मार्मिक चित्रण हुया है सजनी, के कहक आओव मधाई विरह-पयोचि पार किए पाऊव, मझुम नहिं पति आई एखत तखन करि दिवस गमाओल, दिवस दिवस करि मासा मास-मास करि बरस गमाओल, छोड़ लूँ जीवन आसा बरस-बरस कर समय गमाओल, खोल लूं कानुक आसे हिमकर-किरन नलिनी जदि जारन, कि कर्ण माधव मासे इस प्रकार कृष्ण भक्त कवियों ने प्रेम की सभी अवस्थाओं व भाव-दशाओं का सफलतापूर्वक चित्रण किया है भक्ति भावनायदि भक्त - भावना के विषय में बात करें तो कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास , कुंमंदास व मीरा का नाम उल्लेखनीय है सूरदासजी ने वल्लभाचार्य जी से दीक्षा ग्रहण कर लेने के पूर्व प्रथम रूप में भक्ति - भावना की व्यंजना की है नाथ जू अब कै मोहि उबारोपतित में विख्यात पतित हौं पावन नाम विहारोसूर के भक्ति काव्य में अलौकिकता और लौकितता , रागात्मकता और बौद्धिकता , माधुर्य और वात्सल्य सब मिलकर एकाकार हो गए हैं भगवान् कृष्ण के अनन्य भक्ति होने के नाते उनके मन से से सच्चे भाव निकलते हैं उन्होंने ही भ्रमरनी परम्परा को नए रूप में प्रस्तुत किया भक्त - शोरोमणि सूर ने इसमे सगुणोपासना का चित्रण , ह्रदय की अनुभूति के आधार पर किया है अंत में गोपियों अपनी आस्था के बल पर निर्गुण की उपासना का खंडन कर देती हैं उधौ मन नाहिं भए दस-बीसएक हुतो सो गयो श्याम संगको आराधै ईश मीराबाई कृष्ण को अपने प्रेमी ही नही , अपितु पति के रूप में भी स्मरण करती है वे मानतीहै कि वे जन्म - जन्म से ही कृष्ण की प्रेयसी व पत्नी रही हैं वे प्रिय के प्रति आत्म - निवेदन व उपालंभ के रूपमें प्रणय - वेदना की अभिव्यक्ति करती है देखो सईयां हरि मन काठ कियोआवन कह गयो अजहूं न आयो, करि करि गयोखान-पान सुध-बुध सब बिसरी कैसे करि मैं जियोवचन तुम्हार तुमहीं बिसरै, मन मेरों हर लियोमीरां कहे प्रभु गिरधर नागर, तुम बिन फारत हियो भक्ति काव्य के क्षेत्र में मीरा सगुण - निर्गुण श्रद्धा व प्रेम , भक्ति व रहस्यवाद के अन्तर को भरते हुए , माधुर्यभाव को अपनाती है उन्हें तो अपने सांवरियां का ध्यान कराने में , उनको ह्रदय की रागिनी सुनाने व उनके सम्मुख नृत्य करने में ही आनंद आता है आली रे मेरे नैणां बाण पड़ीं चित चढ़ी मेरे माधुरी मुरल उर बिच आन अड़ी कब की ठाढ़ी पंछ निहारूं अपने भवन खड़ी ब्रज भाषा व अन्य भाषाओं का प्रयोगअनेक कवियों ने निःसंकोच कृष्ण की जन्मभूमि में प्रचलित ब्रज भाषा को ही अपने काव्य में प्रयुक्त किया। सूरदास व नंददास जैसे कवियों ने भाषा के रूप को इतना निखार दिया कि कुछ समय बाद यह समस्त उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा बन गई।यद्यपि ब्रज भाषा के अतिरिक्त कवियों ने अपनी-अपनी मातृ भाषाओं में कृष्ण काव्य की रचना की। विद्यापति ने मैथिली भाषा में अनेक भाव प्रकट किए।सप्ति हे कतहु न देखि मधाईकांप शरीर धीन नहि मानस, अवधि निअर मेल आईमाधव मास तिथि भयो माधव अवधि कहए पिआ गेल।मीरा ने राजस्थानी भाषा में अपने भाव प्रकट किए।रमैया बिन नींद न आवैनींद न आवै विरह सतावै, प्रेम की आंच हुलावै।प्रमुख कवि का काव्यमहाकवि सूरदास को कृष्ण भक्त कवियों में सबसे ऊँचा स्थान दिया जाता है। इनके द्वारा रचित ग्रंथों में सूर-सागर, साहित्य-लहरी व सूर-सारावली उल्लेखनीय है।कवि कुंभनदास अष्टछाप कवियों में सबसे बड़े थे, इनके सौ के करीब पद संग्रहित हैं, जिनमें इनकी भक्ति भावना का स्पष्ट परिचय मिलता है।संतन को कहा सींकरी सो काम।कुंभनदास लाल गिरधर बिनु और सवै वे काम।इसके अतिरिक्त परमानंद दास, कृष्णदास गोविंद स्वामी, छीतस्वामी व चतुर्भुज दास आदि भी अष्टछाप कवियों में आते हैं किंतु कवित्व की दृष्टि से सूरदास सबसे ऊपर हैं।राधावल्लभ संप्रादय के कवियों में हित चौरासी बहुत प्रसिद है, जिसे श्री हित हरिवंश जी ने लिखा है। हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में मीरा के अलावा बेलिकिशन रुक्मिनी के रचयिता पृथ्वीराज राठौर का नाम भी उल्लेखनीय है।कृष्ण भक्ति धारा के कवियों ने अपने काव्य में भावात्मकता को ही प्रधानता दी। संगीत के माधुर्य से मानो उनका काव्य और निखर आया। इनके काव्य का भाव व कला पक्ष दोनों ही प्रौढ़ थे व तत्कालीन जन ने उनका भरपूर रसास्वादन किया। ---------------------------पंकज तिवारी'सहज'

सर्वश्रेष्ठ आचरण

सदाचारी पुरुषों की संख्या और शक्ति का जैसे-जैसे हास होता है, वैसे ही वैसे ही संसार में घोर अशांति पैदा होती सदाचार की स्थापना प्राणी मात्र के लिए कल्यानप्रद है जैसे भगवान श्री रामचंद्र जी मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ आचरण कराने के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये सद्पुरुशो द्वारा प्रमाणीत आचरण ही सदाचार है जब तक मनुष्य अपने जीवन को शुद्ध बनानेका कार्य नही करता ,अपने आचार विचार में सच्चाई नही लातातब तक वह धर्म पालन के योग्य नही बनता हमारे हिंदू धर्म का लक्ष्य तत्वज्ञान की प्राप्ति द्वारा कैवल्य मुक्ति पाना है जब की हमारा यह कार्य विचार शक्ति का विकाश किए बिना नही हो सकता ,विचार ही प्राणी के जीवन का वह दीपक है जैसे चित्र शक्ति विश्व शक्ति को प्रकाशित करती है ,वैसे ही हमारी विचार शक्ति जीवो के कर्तव्य पथ को निश्चित करती है विचारशक्ति का सम्यक विकास होने पर यह मालूम होता है कि ब्रम्ह ही इस श्रृष्टि रूपी रंगभूमि पर विलास कर रहा है ,उसके अतिरिक्त इस ब्रम्हांड में कुछ है ही नही इसलिए सबसे पहले मनुष्य बनने के लिए प्राणिमात्र को को प्रयत्न करना चाहिए ,मनुष्य के आकार मात्र से ही कोई मनुष्य नही बन जाता है ,उसमे मनुष्योचित गुण होना चाहिए आज हमारे समाज में वाशनाओ के कारण मनुष्य के चित्त में इतनी पराधीनता आ गई कि वह पूर्ण रूपेण से ईश्वर कि तरफ़ उन्मुख नही हो पाता है जिसके कारण आज हमारा समाज पतन कि ओर अग्रसर हैअतः हमें इससे बचने के लिए अपने अंदर सदाचार कि को अपने गुणों में समाहित करना होगा जिससे हमारे समाज का विकास हो इस कलयुग में ईश्वर कि भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है आज के हमारे परिवेश में तमोगुण इतना बढ़ गया है कि मनुष्य अन्य साधनों को ठीक से नही कर पाता ,तामसी प्रवृति होने के कारण मनुष्य का मन एक जगह पर टिक नही पाता ,अतः इस कलि कल में भगवान को पाने का सर्वश्रेष्ठ साधन है ईश्वर भक्ति और उसका नाम और इस सरल साधना को प्रतेक व्यक्ति कर सकता है--------पंकज संतोष  कुमार तिवारी 

Thursday, January 8, 2009

गायत्री mantra

ओ३म् भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्







तूने हमें उत्पन्न किया

पालन कर रहा है तू तुझ से ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान सृष्टि की वस्तु वस्तु में, तु हो रहा है विद्यमान तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला भावार्थ _ हे परमेश्वर! आप हमारे प्रियतम् प्राण हो हमें अशुभ संकल्पों तथा भौतिक विपत्तियों से हमें दूर रखें हम आपके शुद्ध प्रकाशमय स्वरुप का दर्शन अपने अन्त: करण मे नित्य किया करें हे दिव्य प्रकाशक हमें प्रकाश की ओर ले चल आपका प्रकाशमय स्वरुप हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग में प्रवृत्त करें हम न केवल अभ्युदय अपितु नि:श्रेयस भी प्राप्त करें

गायत्री मंत्र

ओ३म् भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्


हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू तुझ से ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान सृष्टि की वस्तु वस्तु में, तु हो रहा है विद्यमान तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला


भावार्थ _ हे परमेश्वर! आप हमारे प्रियतम् प्राण हो हमें अशुभ संकल्पों तथा भौतिक विपत्तियों से हमें दूर रखें हम आपके शुद्ध प्रकाशमय स्वरुप का दर्शन अपने अन्त: करण मे नित्य किया करें हे दिव्य प्रकाशक हमें प्रकाश की ओर ले चल आपका प्रकाशमय स्वरुप हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग में प्रवृत्त करें हम न केवल अभ्युदय अपितु नि:श्रेयस भी प्राप्त करें

Friday, December 26, 2008

गीता



‍गीता महत्व » श्रीमद्‍भगवद्‍गीता
अर्जुनविषादयोग- नामक पहला अध्याय
01-11
दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य का कथन।
12-19
दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन
20-27
अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग
28-47
मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन

सांख्ययोग-नामक दूसरा अध्याय
01-10
अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद
11-30
सांख्ययोग का विषय
31-38
क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण
39-53
कर्मयोग का विषय
54-72
स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा

कर्मयोग- नामक तीसरा अध्याय
01-08
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण
09-16
यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण
17-24
ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
25-35
अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा
36-43
काम के निरोध का विषय

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग- नामक चौथा अध्याय
01-18
सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय
19-23
योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा
24-32
फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन
33-42
ज्ञान की महिमा

कर्मसंन्यासयोग- नामक पाँचवाँ अध्याय
01-06
सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय
07-12
सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
13-26
ज्ञानयोग का विषय
27-29
भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन

आत्मसंयमयोग- नामक छठा अध्याय
01-04
कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण
05-10
आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण
11-32
विस्तार से ध्यान योग का विषय
33-36
मन के निग्रह का विषय
37-47
योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

ज्ञानविज्ञानयोग- नामक सातवाँ अध्याय
01-07
विज्ञान सहित ज्ञान का विषय
08-12
संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन
13-19
आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा
20-23
अन्य देवताओं की उपासना का विषय
24-30
भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा

अक्षरब्रह्मयोग- नामक आठवाँ अध्याय
01-07
ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर
08-22
भक्ति योग का विषय
23-28
शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय

राजविद्याराजगुह्ययोग- नामक नौवाँ अध्याय
01-06
प्रभावसहित ज्ञान का विषय
07-10
जगत की उत्पत्ति का विषय
11-15
भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का प्रकार
16-19
सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन
20-25
सकाम और निष्काम उपासना का फल
26-34
निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा

अगले नौ अध्याय
श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय
1.
अर्जुनविषादयोग
2.
सांख्ययोग
3.
कर्मयोग
4.
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
5.
कर्मसंन्यासयोग
6.
आत्मसंयमयोग
7.
ज्ञानविज्ञानयोग
8.
अक्षरब्रह्मयोग
9.
राजविद्याराजगुह्ययोग
10.
विभूतियोग
11.
विश्वरूपदर्शनयोग
12.
भक्तियोग
13.
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
14.
गुणत्रयविभागयोग
15.
पुरुषोत्तमयोग
16.
दैवासुरसम्पद्विभागयोग
17.
श्रद्धात्रयविभागयोग
18.
मोक्षसंन्यासयोग

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता



‍गीता महत्व » श्रीमद्‍भगवद्‍गीता
अर्जुनविषादयोग- नामक पहला अध्याय
01-11
दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य का कथन।
12-19
दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन
20-27
अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग
28-47
मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन

सांख्ययोग-नामक दूसरा अध्याय
01-10
अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद
11-30
सांख्ययोग का विषय
31-38
क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण
39-53
कर्मयोग का विषय
54-72
स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा

कर्मयोग- नामक तीसरा अध्याय
01-08
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण
09-16
यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण
17-24
ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
25-35
अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा
36-43
काम के निरोध का विषय

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग- नामक चौथा अध्याय
01-18
सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय
19-23
योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा
24-32
फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन
33-42
ज्ञान की महिमा

कर्मसंन्यासयोग- नामक पाँचवाँ अध्याय
01-06
सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय
07-12
सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
13-26
ज्ञानयोग का विषय
27-29
भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन

आत्मसंयमयोग- नामक छठा अध्याय
01-04
कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण
05-10
आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण
11-32
विस्तार से ध्यान योग का विषय
33-36
मन के निग्रह का विषय
37-47
योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

ज्ञानविज्ञानयोग- नामक सातवाँ अध्याय
01-07
विज्ञान सहित ज्ञान का विषय
08-12
संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन
13-19
आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा
20-23
अन्य देवताओं की उपासना का विषय
24-30
भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा

अक्षरब्रह्मयोग- नामक आठवाँ अध्याय
01-07
ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर
08-22
भक्ति योग का विषय
23-28
शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय

राजविद्याराजगुह्ययोग- नामक नौवाँ अध्याय
01-06
प्रभावसहित ज्ञान का विषय
07-10
जगत की उत्पत्ति का विषय
11-15
भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का प्रकार
16-19
सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन
20-25
सकाम और निष्काम उपासना का फल
26-34
निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा

अगले नौ अध्याय
श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय
1.
अर्जुनविषादयोग
2.
सांख्ययोग
3.
कर्मयोग
4.
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
5.
कर्मसंन्यासयोग
6.
आत्मसंयमयोग
7.
ज्ञानविज्ञानयोग
8.
अक्षरब्रह्मयोग
9.
राजविद्याराजगुह्ययोग
10.
विभूतियोग
11.
विश्वरूपदर्शनयोग
12.
भक्तियोग
13.
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
14.
गुणत्रयविभागयोग
15.
पुरुषोत्तमयोग
16.
दैवासुरसम्पद्विभागयोग
17.
श्रद्धात्रयविभागयोग
18.
मोक्षसंन्यासयोग -------------------------
-----------------------------पंकज तिवारी सहज

श्रीमद्भागवदगीता

श्रीमद्भागवदगीता


कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बच्चों को अर्थ और भाव के साथ श्रीगीताजी का अध्ययन कराएँ। स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए भगवान की आज्ञानुसार साधन करने में समर्थ हो जाएँ क्योंकि अतिदुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी दु:खमूलक क्षणभंगुर भोगों के भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है।गीताजी का पाठ आरंभ करने से पूर्व निम्न श्लोक को भावार्थ सहित पढ़कर श्रीहरिविष्णु का ध्यान करें--अथ ध्यानम्शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भावार्थ : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता
हूँ।यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।
भावार्थ : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।
श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का पाठ करें

Thursday, September 11, 2008

भगवान गणपति

गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। उनकी शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रवण (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्र बिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है। चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक उनकी चार भुजाएँ हैं 'वे लंबोदर हैं क्योंकि समस्त चराचर सृष्टि उनके उदर में विचरती है। बड़े कान अधिक ग्राह्यशक्ति व छोटी-पैनी आँखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं। उनकी लंबी नाक महाबुद्धित्व का प्रतीक है।प्राचीन समय में सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहाँ आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया।कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और काँपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख माँगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा 'तूने चोर की तरह मेरी सहधर्मिणी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा।

काँपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की-'दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था। मुझे क्षमा कर दें। ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहाँ गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे (हर युग में गणेशजी ने अलग-अलग अवतार लिए) तब तू उनका वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे।

गणेशजी की बायोग्राफी

गणेशजी के अनेक नाम हैं लेकिन ये 12 नाम प्रमुख हैं-
1.सुमुख,
२।एकदंत,
3.कपिल,
4.गजकर्णक,
5.लंबोदर,
६. विकट,
७. विघ्न-नाश,
८.विनायक,
9.धूम्रकेतु,
10.गणाध्यक्ष,
11. भालचंद्र,
12.गजानन

पिता- भगवान शिव
माता -भगवती पार्वती
भाई - श्रीकार्तिकेय
बहन -माँ संतोषी पुत्र दो 1। शुभ 2। लाभ
पत्नी दो 1।रिद्धि 2।सिद्धि
प्रियभोग (मिष्ठान्न) मोदक
प्रिय पुष्प- लाल के
वस्तु- दुर्वा (दूब) शमी पत्र
अधिपति जल तत्व के
प्रमुख अस्त्र-पाश, अंकुश
ध्यान रहे की गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को न देखें और गणेशजी को तुलसी पत्र भी नहीं चढ़ता है।

आपका शुभचिंतक
पंकज तिवारी'सहज'

राशिः अनुसार मंत्र

यदि व्यक्ति राशि के अनुसार मंत्र जाप करे तो शीघ्र सफलता मिलती है। मंत्र पाठ से व्यक्ति हर प्रकार के संकट से मुक्त रहता है। आर्थिक रूप से संपन्न हो जाता है। साथ ही जो आपके मार्ग में रोड़ा अटकाते हैं, वे भी इस जाप से नतमस्तक हो जाते हैं। यदि आप अपनी राशि के अनुसार नियमित रूप से जाप करेंगे तो आप कभी अस्वस्थ नहीं होंगे तथा हर प्रकार के संकट से मुक्त रहेंगे:-------------

मेष : ऊँ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:

वृषभ : ऊँ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:

मिथुन : ऊँ क्लीं कृष्णायै नम:

कर्क : ऊँ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:

सिंह : ऊँ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:

कन्या : ऊँ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:

तुला : ऊँ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:

वृश्चिक : ऊँ नारायणाय सुरसिंहायै नम:

धनु : ऊँ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:

मकर : ऊँ श्रीं वत्सलायै नम:

कुंभ : श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:

मीन : ऊँ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम:

अतः आप लोगो से सविनय निवेदन है की अपनी राशिः के अनुसार मंत्र का जप करके लाभ उठाये

आपका अपना

पंकज तिवारी 'सहज'

Wednesday, September 10, 2008

गणपति बप्पा मोरया'

इन दिनों सारा महाराष्ट्र 'गणपति बप्पा मोरया' के स्वरों से गूँज रहा है। पूरे दस दिनों तक जैसे गणपति का जादू-सा छा जाता है। घरों में, गलियों में, सड़कों पर, मैदानों में - और मनों में - गणपति पूजा की धूम-सी मची रहती है। मचे भी क्यों न? आखिर गणपति गजेन्द्र हैं, गणों के पति । शास्त्रों में, पुराणों में कई-कई रूपों में गणपति को सराहा गया है, पूजनीय बताया गया है। अध्यात्म और रहस्य का एक विराट संसार जुड़ा है गणपति के नाम के साथ। उनकी पूजा-अर्चना करके भय से मुक्ति का, दुःखहर्ता के साए में होने का,सुखकर्ता के आश्वासनों को जीने का एक अहसास न जाने कब से भारतीय मानस कर रहा है । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेश पूजा को एक नया आयाम दिया था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने। उन्होंने गणेशोत्सव की एक नई परंपरा शुरू की- गणपति की सार्वजनिक पूजा के माध्यम से समाज और राष्ट्र को अभय और मुक्ति का एक नया अवलम्बन दिया- अत्याचार केभय से मुक्त होने का, मानवीय मूल्यों के प्रति, स्वतंत्रता के आदर्शों के प्रति निष्ठा जगाने का एक माध्यम बना दिया लोकमान्य ने गणपति को।

गणपति बप्पा मोरया'

इन दिनों सारा महाराष्ट्र 'गणपति बप्पा मोरया' के स्वरों से गूँज रहा है। पूरे दस दिनों तक जैसे गणपति का जादू-सा छा जाता है। घरों में, गलियों में, सड़कों पर, मैदानों में - और मनों में - गणपति पूजा की धूम-सी मची रहती है। मचे भी क्यों न? आखिर गणपति गजेन्द्र हैं, गणों के पति । शास्त्रों में, पुराणों में कई-कई रूपों में गणपति को सराहा गया है, पूजनीय बताया गया है। अध्यात्म और रहस्य का एक विराट संसार जुड़ा है गणपति के नाम के साथ। उनकी पूजा-अर्चना करके भय से मुक्ति का, दुःखहर्ता के साए में होने का,सुखकर्ता के आश्वासनों को जीने का एक अहसास न जाने कब से भारतीय मानस कर रहा है । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेश पूजा को एक नया आयाम दिया था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने। उन्होंने गणेशोत्सव की एक नई परंपरा शुरू की- गणपति की सार्वजनिक पूजा के माध्यम से समाज और राष्ट्र को अभय और मुक्ति का एक नया अवलम्बन दिया- अत्याचार केभय से मुक्त होने का, मानवीय मूल्यों के प्रति, स्वतंत्रता के आदर्शों के प्रति निष्ठा जगाने का एक माध्यम बना दिया लोकमान्य ने गणपति को।

Friday, September 5, 2008

मंगलकर्ता 'श्रीगणेश'


मंगलकर्ता 'श्रीगणेश'
-
विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, हर काम को निर्विघ्न संपन्न कराने वाले देवता हैं गणेश। मुख्यतः महाराष्ट्र से शुरू होने वाले गणेश उत्सव को धीरे-धीरे सारे देश ने सहजता से अपना लिया। आज हर गली, हर नुक्कड़ का अपना एक गणेश होता है। लेकिन गणेश का यह सार्वजनिकीकरण क्या आज भी उसी स्वरूप में है, जिसके जरिए इसकी शुरुआत हुई थी?यह त्योहारों की बरसात का भी मौसम है और इसकी जोर-शोर से शुरुआत होती है हर काम का निर्विघ्न शुभारंभ करने वाले 'श्रीगणेश' से। गणेश उत्सव करीब है और दिनचर्या तथा काम की भागदौड़ के बीच मशीनी बन चुके आप इस हकीकत को तब जानते हैं जब मोहल्ले के बच्चों की टोली चंदे के लिए घर के गेट पर खड़ी होती है। आप पश्चाताप की-सी सोच के साथ चंदा उन बच्चों के हवाले कर रसीद पा लेते हैं। कहीं-कहीं हर साल बढ़ती जा रही चंदे की रकम को लेकर झिक-झिक भी मचती है, लेकिन अंततः 'भगवान का मामला है', 'चलो बच्चे कुछ कर तो रहे हैं', 'इसी बहाने अपना भी पुण्य कार्य में योगदान हो जाएगा', जैसे कई तरह के विचारों के साथ चंदा अर्पण कर दिया जाता है। अगले दिन ऑफिस से आकर आप हाथ-मुँह ही धो रहे होते हैं कि दरवाजे की घंटी बजती है, पत्नी दरवाजा खोलती है औरकुछ समय बाद भुनभुनाती हुई अंदर आती है- 'सुबह से ये दूसरी बार है।
विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, हर काम को निर्विघ्न संपन्न कराने वाले देवता हैं गणेश। मुख्यतः महाराष्ट्र से शुरू होने वाले गणेश उत्सव को धीरे-धीरे सारे देश ने सहजता से अपना लिया। आज हर गली, हर नुक्कड़ का अपना एक गणेश होता है।
अरे कोई कितना चंदा देगा? पैसे क्या झाड़ पर उगते हैं?' आदि-इत्यादि। पता चलता है कि मोहल्ले में तीसरी जगह गणेशजी स्थापित हो रहे हैं और इसका चंदा भी आप नहीं देंगे तो कौन देगा? त्योहार मनाने की सारी खुशी आपके मन से काफूर हो जाती है और भुनभुनाते हुए या तो दरवाजा बिना चंदा दिए बंद कर दिया जाता है या फिर थोड़ा कुछ दे-दुआकर पीछा छुड़ाया जाता है।खैर... ढेर सारी 'फलाँ मंडल, अलाँ मंडल' की रसीदों के साथ आपके हाथ में आते हैं कुछ रंग-बिरंगे कागज जिनमें छपा होता है पूरे गणेश उत्सव का कार्यक्रम, वो भी ढेर सारी मात्राओं की गलतियों सहित (ये हमारा मौलिक अधिकार जो ठहरा)। अचानक उस पर नजर डालने के बाद कागज थामने वाली आंटी आश्चर्य के साथ चिल्लाती हैं- 'क्यों रे! इसमें 'तंबोला' तो है ही नहीं? बिना तंबोला के क्या मजा आएगा?' और बच्चे उतने ही शांत और परिपक्व भाव से समझाते हैं- 'अरे आंटी ऐसा हो सकता है क्या! तंबोला तो रोज ही होगा। वो तो सबसे बड़ा 'अट्रेक्शन' है। उसको कैसे छोड़ सकते हैं?' आंटी राहत की साँस लेकर अदा के साथ मुस्कुराते हुए कहती हैं- 'हाँ, वही तो। बिना तंबोला के भी क्या गणेश उत्सव मनता है?'अब आता है दिन गणेश चतुर्थी का। सभी दलों को बढ़-चढ़कर दिखावा करना है कि उनका आयोजन 'बेश्ट' है। लिहाजा पूरी दोपहर कॉलोनी की सड़कें 'देवा हो देवा...' के शोर से गूँजती रहती हैं। शाम होते ही हर पांडाल से आवाजें आने लगती हैं। बहुत कम स्थान ऐसेहोते हैं जहाँ सचमुच एकजुट होकर त्योहार मनाने और रचनात्मक कार्य करने का जज्बा दिखाई देता है। सारे शुरुआती कार्यक्रमों में अधिकांशतः बच्चे या वो माता-पिता आते हैं जिनके बच्चे किसी प्रतियोगिता में भाग ले रहे हों। पूरे समय एक प्रतियोगिता मंच पर और दूसरी बच्चों के माता-पिता के बीच चलती रहती है कि किसका बच्चा 'बेश्ट।' सबसे आखिर में आती है बारी 'तंबोला' की। मंच पर आयोजकों में से एक बच्चा तंबोला का सामान लेकर बैठ जाता है और शुरू होता है... 'तृतीय विश्वयुद्ध।' तंबोला के मामले में सबकी एकजुटता और उत्साह देखते ही बनता है। बारिश हो या और कोई व्यवधान, सब एक स्वर में उससे लड़ने को तैयार हो जाते हैं।
WDतंबोला खत्म होने के बाद देर रात गए लोगों में से जिन्हें पैसा मिला वो खुशी-खुशी और जिन्हें नहीं मिला वो थोड़े तंज के साथ घरों की ओर लौटते हैं। कुछ फिकरे भी उछाले जाते हैं- 'आज तो भाभीजी की लॉटरी खुली है। कल पार्टी मिलेगी।' 'भइया अपने हाथ तो कुछ नहीं आया, सब शर्माजी के घर में गया है।' 'आज तो खूब कमाया भई निक्कू ने, लड़का लकी है- हाँ।' इन बातों में आपको कटाक्ष और व्यंग्य के तीखे शूल साफ दिखाई देते हैं। जहाँ तंबोला का एक गेम जीतना जीवन की सबसे बड़ी उपलिब्ध बन जाती है। क्या वाकई ऐसेही त्योहार चाहते हैं हम?जब आजादी के मतवाले आंदोलनों में जुटे थे तब संस्कृति को एक नए रूप में प्रयोग करने की ठानी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने। उन्होंने महाराष्ट्र में मनाए जाने वाले गणेश उत्सव को स्वतंत्रता आंदोलन तथा जनजागृति से जोड़ने की पहल की। तिलक ने 1893 में यह परंपराशुरू की। तिलक अंधविश्वास में डूबी जनता में आत्मविश्वास तथा सद्भाव पैदा करने लगे। उन्होंने गणपति महोत्सव को सार्वजनिक रूप देकर सामूहिक पूजा को मनुष्य की सामूहिक भावना के रूप में संगठित किया। आज इस उत्सव की तंबोलानुमा हालत देखकर बुद्धि के देवता गणेश भी लोगों की बुद्धि पर तरस खाते होंगे कि उनके लड्डुओं को सूखे मेवों और चाँदी के वर्क का तथा उनके जन्मदिन को तंबोला का पर्याय बना दिया गया। वे तो चिमटी भर चावल और चम्मच भर दूध से भी खुश थे! उन्होंने माता-पिता को संपूर्ण विश्व की संज्ञा देने, कर्तव्य पालन में अडिग रहने तथा बुद्धिमत्ता से प्राणीमात्र का भला करने का जो संदेश दिया वह केवल ढेर सारी गणेश प्रतिमाओं, तंबोला तथा 'संगीत निशा' तक सिमटकर रह गया।त्योहार हमारे मन के उल्लास का प्रतीक हैं और आज भौतिकता के पीछे भागती दुनिया में तो इनकी जरूरत हमें एक-दूसरे से जोड़ने के लिए और भी बढ़ जाती है, लेकिन हम इन्हें मात्र मनोरंजन और दिखावे में बदल चुके हैं। कॉलोनी के चार कोनों में जब बच्चों का हर 'ग्रुप' अलग-अलग गणेशजी बैठाने की जिद पर अड़ता है तो बाजार में एक गणेश प्रतिमा कम होती है लेकिन भविष्य के मन में होड़ और दिखावे के कई सारे मंत्र बैठ जाते हैं और ये मंत्र दिलों में दूरियाँ बढ़ाने का काम करते रहते हैं। साँझा चूल्हा या चौपाल जैसे सुख पहले ही हमसे दूर होते जा रहे हैं। त्योहारों पर एकजुट हो, ढेर सारा आंनद पाने का समय अब हमारे पास कम होता जा रहा है। क्या हमें अब भी कॉलोनी में चार अलग गणेश उत्सवों के आयोजन की कामना है?

Monday, August 25, 2008

मम्मी-पापा

मम्मी-पापा

मेरी मम्मी सबसे अच्छी !
मुझे खूब प्यार वो करती !!
पापा मेरे और भी अच्छे !
संग मेरे वो रोज खेलते!!
सुबह -सवेरे उठ कर आते प्यार से मुझको दोनो जगाते!
मम्मी मेरी खाना बनाती !!
पापा मुझे तैयार कराते !
खुशी -खुशी मैं बस्ता लेता!!
पापा मुझको छोड़ कर आते!
स्कूल से जब मैं पढ़ कर आता!!
मम्मी से फिर मैं खाना खाता!
होम -वर्क मैं अपना करके गोदी में मम्मी के सो जाता !!
शाम को जब पापा हैं आते पार्क में मुझको खेल खिलाते !
रात को सोने से पहले मैं अगले दिन का बैग लगाता! !
तुम भी मुझ जैसे बन जाओ पापा -मम्मी के प्यारे बन जाओ!
दोनों जब मुझे प्यार हैं करते दुनिया से न्यारे हैं लगते !!
पंकज तिवारी "सहज"