Wednesday, September 10, 2008
गणपति बप्पा मोरया'
इन दिनों सारा महाराष्ट्र 'गणपति बप्पा मोरया' के स्वरों से गूँज रहा है। पूरे दस दिनों तक जैसे गणपति का जादू-सा छा जाता है। घरों में, गलियों में, सड़कों पर, मैदानों में - और मनों में - गणपति पूजा की धूम-सी मची रहती है। मचे भी क्यों न? आखिर गणपति गजेन्द्र हैं, गणों के पति । शास्त्रों में, पुराणों में कई-कई रूपों में गणपति को सराहा गया है, पूजनीय बताया गया है। अध्यात्म और रहस्य का एक विराट संसार जुड़ा है गणपति के नाम के साथ। उनकी पूजा-अर्चना करके भय से मुक्ति का, दुःखहर्ता के साए में होने का,सुखकर्ता के आश्वासनों को जीने का एक अहसास न जाने कब से भारतीय मानस कर रहा है । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेश पूजा को एक नया आयाम दिया था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने। उन्होंने गणेशोत्सव की एक नई परंपरा शुरू की- गणपति की सार्वजनिक पूजा के माध्यम से समाज और राष्ट्र को अभय और मुक्ति का एक नया अवलम्बन दिया- अत्याचार केभय से मुक्त होने का, मानवीय मूल्यों के प्रति, स्वतंत्रता के आदर्शों के प्रति निष्ठा जगाने का एक माध्यम बना दिया लोकमान्य ने गणपति को।
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