गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। उनकी शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रवण (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्र बिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है। चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक उनकी चार भुजाएँ हैं 'वे लंबोदर हैं क्योंकि समस्त चराचर सृष्टि उनके उदर में विचरती है। बड़े कान अधिक ग्राह्यशक्ति व छोटी-पैनी आँखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं। उनकी लंबी नाक महाबुद्धित्व का प्रतीक है।प्राचीन समय में सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहाँ आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया।कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और काँपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख माँगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा 'तूने चोर की तरह मेरी सहधर्मिणी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा।
काँपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की-'दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था। मुझे क्षमा कर दें। ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहाँ गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे (हर युग में गणेशजी ने अलग-अलग अवतार लिए) तब तू उनका वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे।
Thursday, September 11, 2008
गणेशजी की बायोग्राफी
गणेशजी के अनेक नाम हैं लेकिन ये 12 नाम प्रमुख हैं-
1.सुमुख,
२।एकदंत,
3.कपिल,
4.गजकर्णक,
5.लंबोदर,
६. विकट,
७. विघ्न-नाश,
८.विनायक,
9.धूम्रकेतु,
10.गणाध्यक्ष,
11. भालचंद्र,
12.गजानन
पिता- भगवान शिव
माता -भगवती पार्वती
भाई - श्रीकार्तिकेय
बहन -माँ संतोषी पुत्र दो 1। शुभ 2। लाभ
पत्नी दो 1।रिद्धि 2।सिद्धि
प्रियभोग (मिष्ठान्न) मोदक
प्रिय पुष्प- लाल के
वस्तु- दुर्वा (दूब) शमी पत्र
अधिपति जल तत्व के
प्रमुख अस्त्र-पाश, अंकुश
ध्यान रहे की गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को न देखें और गणेशजी को तुलसी पत्र भी नहीं चढ़ता है।
आपका शुभचिंतक
पंकज तिवारी'सहज'
1.सुमुख,
२।एकदंत,
3.कपिल,
4.गजकर्णक,
5.लंबोदर,
६. विकट,
७. विघ्न-नाश,
८.विनायक,
9.धूम्रकेतु,
10.गणाध्यक्ष,
11. भालचंद्र,
12.गजानन
पिता- भगवान शिव
माता -भगवती पार्वती
भाई - श्रीकार्तिकेय
बहन -माँ संतोषी पुत्र दो 1। शुभ 2। लाभ
पत्नी दो 1।रिद्धि 2।सिद्धि
प्रियभोग (मिष्ठान्न) मोदक
प्रिय पुष्प- लाल के
वस्तु- दुर्वा (दूब) शमी पत्र
अधिपति जल तत्व के
प्रमुख अस्त्र-पाश, अंकुश
ध्यान रहे की गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को न देखें और गणेशजी को तुलसी पत्र भी नहीं चढ़ता है।
आपका शुभचिंतक
पंकज तिवारी'सहज'
राशिः अनुसार मंत्र
यदि व्यक्ति राशि के अनुसार मंत्र जाप करे तो शीघ्र सफलता मिलती है। मंत्र पाठ से व्यक्ति हर प्रकार के संकट से मुक्त रहता है। आर्थिक रूप से संपन्न हो जाता है। साथ ही जो आपके मार्ग में रोड़ा अटकाते हैं, वे भी इस जाप से नतमस्तक हो जाते हैं। यदि आप अपनी राशि के अनुसार नियमित रूप से जाप करेंगे तो आप कभी अस्वस्थ नहीं होंगे तथा हर प्रकार के संकट से मुक्त रहेंगे:-------------
मेष : ऊँ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:
वृषभ : ऊँ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:
मिथुन : ऊँ क्लीं कृष्णायै नम:
कर्क : ऊँ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:
सिंह : ऊँ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:
कन्या : ऊँ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:
तुला : ऊँ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:
वृश्चिक : ऊँ नारायणाय सुरसिंहायै नम:
धनु : ऊँ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:
मकर : ऊँ श्रीं वत्सलायै नम:
कुंभ : श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:
मीन : ऊँ क्लीं उद्धृताय उद्धारिणे नम:
मेष : ऊँ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:
वृषभ : ऊँ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:
मिथुन : ऊँ क्लीं कृष्णायै नम:
कर्क : ऊँ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:
सिंह : ऊँ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:
कन्या : ऊँ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:
तुला : ऊँ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:
वृश्चिक : ऊँ नारायणाय सुरसिंहायै नम:
धनु : ऊँ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:
मकर : ऊँ श्रीं वत्सलायै नम:
कुंभ : श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:
मीन : ऊँ क्लीं उद्धृताय उद्धारिणे नम:
अतः आप लोगो से सविनय निवेदन है की अपनी राशिः के अनुसार मंत्र का जप करके लाभ उठाये
आपका अपना
पंकज तिवारी 'सहज'
Wednesday, September 10, 2008
गणपति बप्पा मोरया'
इन दिनों सारा महाराष्ट्र 'गणपति बप्पा मोरया' के स्वरों से गूँज रहा है। पूरे दस दिनों तक जैसे गणपति का जादू-सा छा जाता है। घरों में, गलियों में, सड़कों पर, मैदानों में - और मनों में - गणपति पूजा की धूम-सी मची रहती है। मचे भी क्यों न? आखिर गणपति गजेन्द्र हैं, गणों के पति । शास्त्रों में, पुराणों में कई-कई रूपों में गणपति को सराहा गया है, पूजनीय बताया गया है। अध्यात्म और रहस्य का एक विराट संसार जुड़ा है गणपति के नाम के साथ। उनकी पूजा-अर्चना करके भय से मुक्ति का, दुःखहर्ता के साए में होने का,सुखकर्ता के आश्वासनों को जीने का एक अहसास न जाने कब से भारतीय मानस कर रहा है । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेश पूजा को एक नया आयाम दिया था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने। उन्होंने गणेशोत्सव की एक नई परंपरा शुरू की- गणपति की सार्वजनिक पूजा के माध्यम से समाज और राष्ट्र को अभय और मुक्ति का एक नया अवलम्बन दिया- अत्याचार केभय से मुक्त होने का, मानवीय मूल्यों के प्रति, स्वतंत्रता के आदर्शों के प्रति निष्ठा जगाने का एक माध्यम बना दिया लोकमान्य ने गणपति को।
गणपति बप्पा मोरया'
इन दिनों सारा महाराष्ट्र 'गणपति बप्पा मोरया' के स्वरों से गूँज रहा है। पूरे दस दिनों तक जैसे गणपति का जादू-सा छा जाता है। घरों में, गलियों में, सड़कों पर, मैदानों में - और मनों में - गणपति पूजा की धूम-सी मची रहती है। मचे भी क्यों न? आखिर गणपति गजेन्द्र हैं, गणों के पति । शास्त्रों में, पुराणों में कई-कई रूपों में गणपति को सराहा गया है, पूजनीय बताया गया है। अध्यात्म और रहस्य का एक विराट संसार जुड़ा है गणपति के नाम के साथ। उनकी पूजा-अर्चना करके भय से मुक्ति का, दुःखहर्ता के साए में होने का,सुखकर्ता के आश्वासनों को जीने का एक अहसास न जाने कब से भारतीय मानस कर रहा है । स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गणेश पूजा को एक नया आयाम दिया था लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने। उन्होंने गणेशोत्सव की एक नई परंपरा शुरू की- गणपति की सार्वजनिक पूजा के माध्यम से समाज और राष्ट्र को अभय और मुक्ति का एक नया अवलम्बन दिया- अत्याचार केभय से मुक्त होने का, मानवीय मूल्यों के प्रति, स्वतंत्रता के आदर्शों के प्रति निष्ठा जगाने का एक माध्यम बना दिया लोकमान्य ने गणपति को।
Friday, September 5, 2008
मंगलकर्ता 'श्रीगणेश'
मंगलकर्ता 'श्रीगणेश'
-
विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, हर काम को निर्विघ्न संपन्न कराने वाले देवता हैं गणेश। मुख्यतः महाराष्ट्र से शुरू होने वाले गणेश उत्सव को धीरे-धीरे सारे देश ने सहजता से अपना लिया। आज हर गली, हर नुक्कड़ का अपना एक गणेश होता है। लेकिन गणेश का यह सार्वजनिकीकरण क्या आज भी उसी स्वरूप में है, जिसके जरिए इसकी शुरुआत हुई थी?यह त्योहारों की बरसात का भी मौसम है और इसकी जोर-शोर से शुरुआत होती है हर काम का निर्विघ्न शुभारंभ करने वाले 'श्रीगणेश' से। गणेश उत्सव करीब है और दिनचर्या तथा काम की भागदौड़ के बीच मशीनी बन चुके आप इस हकीकत को तब जानते हैं जब मोहल्ले के बच्चों की टोली चंदे के लिए घर के गेट पर खड़ी होती है। आप पश्चाताप की-सी सोच के साथ चंदा उन बच्चों के हवाले कर रसीद पा लेते हैं। कहीं-कहीं हर साल बढ़ती जा रही चंदे की रकम को लेकर झिक-झिक भी मचती है, लेकिन अंततः 'भगवान का मामला है', 'चलो बच्चे कुछ कर तो रहे हैं', 'इसी बहाने अपना भी पुण्य कार्य में योगदान हो जाएगा', जैसे कई तरह के विचारों के साथ चंदा अर्पण कर दिया जाता है। अगले दिन ऑफिस से आकर आप हाथ-मुँह ही धो रहे होते हैं कि दरवाजे की घंटी बजती है, पत्नी दरवाजा खोलती है औरकुछ समय बाद भुनभुनाती हुई अंदर आती है- 'सुबह से ये दूसरी बार है।
विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, हर काम को निर्विघ्न संपन्न कराने वाले देवता हैं गणेश। मुख्यतः महाराष्ट्र से शुरू होने वाले गणेश उत्सव को धीरे-धीरे सारे देश ने सहजता से अपना लिया। आज हर गली, हर नुक्कड़ का अपना एक गणेश होता है।
अरे कोई कितना चंदा देगा? पैसे क्या झाड़ पर उगते हैं?' आदि-इत्यादि। पता चलता है कि मोहल्ले में तीसरी जगह गणेशजी स्थापित हो रहे हैं और इसका चंदा भी आप नहीं देंगे तो कौन देगा? त्योहार मनाने की सारी खुशी आपके मन से काफूर हो जाती है और भुनभुनाते हुए या तो दरवाजा बिना चंदा दिए बंद कर दिया जाता है या फिर थोड़ा कुछ दे-दुआकर पीछा छुड़ाया जाता है।खैर... ढेर सारी 'फलाँ मंडल, अलाँ मंडल' की रसीदों के साथ आपके हाथ में आते हैं कुछ रंग-बिरंगे कागज जिनमें छपा होता है पूरे गणेश उत्सव का कार्यक्रम, वो भी ढेर सारी मात्राओं की गलतियों सहित (ये हमारा मौलिक अधिकार जो ठहरा)। अचानक उस पर नजर डालने के बाद कागज थामने वाली आंटी आश्चर्य के साथ चिल्लाती हैं- 'क्यों रे! इसमें 'तंबोला' तो है ही नहीं? बिना तंबोला के क्या मजा आएगा?' और बच्चे उतने ही शांत और परिपक्व भाव से समझाते हैं- 'अरे आंटी ऐसा हो सकता है क्या! तंबोला तो रोज ही होगा। वो तो सबसे बड़ा 'अट्रेक्शन' है। उसको कैसे छोड़ सकते हैं?' आंटी राहत की साँस लेकर अदा के साथ मुस्कुराते हुए कहती हैं- 'हाँ, वही तो। बिना तंबोला के भी क्या गणेश उत्सव मनता है?'अब आता है दिन गणेश चतुर्थी का। सभी दलों को बढ़-चढ़कर दिखावा करना है कि उनका आयोजन 'बेश्ट' है। लिहाजा पूरी दोपहर कॉलोनी की सड़कें 'देवा हो देवा...' के शोर से गूँजती रहती हैं। शाम होते ही हर पांडाल से आवाजें आने लगती हैं। बहुत कम स्थान ऐसेहोते हैं जहाँ सचमुच एकजुट होकर त्योहार मनाने और रचनात्मक कार्य करने का जज्बा दिखाई देता है। सारे शुरुआती कार्यक्रमों में अधिकांशतः बच्चे या वो माता-पिता आते हैं जिनके बच्चे किसी प्रतियोगिता में भाग ले रहे हों। पूरे समय एक प्रतियोगिता मंच पर और दूसरी बच्चों के माता-पिता के बीच चलती रहती है कि किसका बच्चा 'बेश्ट।' सबसे आखिर में आती है बारी 'तंबोला' की। मंच पर आयोजकों में से एक बच्चा तंबोला का सामान लेकर बैठ जाता है और शुरू होता है... 'तृतीय विश्वयुद्ध।' तंबोला के मामले में सबकी एकजुटता और उत्साह देखते ही बनता है। बारिश हो या और कोई व्यवधान, सब एक स्वर में उससे लड़ने को तैयार हो जाते हैं।
WDतंबोला खत्म होने के बाद देर रात गए लोगों में से जिन्हें पैसा मिला वो खुशी-खुशी और जिन्हें नहीं मिला वो थोड़े तंज के साथ घरों की ओर लौटते हैं। कुछ फिकरे भी उछाले जाते हैं- 'आज तो भाभीजी की लॉटरी खुली है। कल पार्टी मिलेगी।' 'भइया अपने हाथ तो कुछ नहीं आया, सब शर्माजी के घर में गया है।' 'आज तो खूब कमाया भई निक्कू ने, लड़का लकी है- हाँ।' इन बातों में आपको कटाक्ष और व्यंग्य के तीखे शूल साफ दिखाई देते हैं। जहाँ तंबोला का एक गेम जीतना जीवन की सबसे बड़ी उपलिब्ध बन जाती है। क्या वाकई ऐसेही त्योहार चाहते हैं हम?जब आजादी के मतवाले आंदोलनों में जुटे थे तब संस्कृति को एक नए रूप में प्रयोग करने की ठानी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने। उन्होंने महाराष्ट्र में मनाए जाने वाले गणेश उत्सव को स्वतंत्रता आंदोलन तथा जनजागृति से जोड़ने की पहल की। तिलक ने 1893 में यह परंपराशुरू की। तिलक अंधविश्वास में डूबी जनता में आत्मविश्वास तथा सद्भाव पैदा करने लगे। उन्होंने गणपति महोत्सव को सार्वजनिक रूप देकर सामूहिक पूजा को मनुष्य की सामूहिक भावना के रूप में संगठित किया। आज इस उत्सव की तंबोलानुमा हालत देखकर बुद्धि के देवता गणेश भी लोगों की बुद्धि पर तरस खाते होंगे कि उनके लड्डुओं को सूखे मेवों और चाँदी के वर्क का तथा उनके जन्मदिन को तंबोला का पर्याय बना दिया गया। वे तो चिमटी भर चावल और चम्मच भर दूध से भी खुश थे! उन्होंने माता-पिता को संपूर्ण विश्व की संज्ञा देने, कर्तव्य पालन में अडिग रहने तथा बुद्धिमत्ता से प्राणीमात्र का भला करने का जो संदेश दिया वह केवल ढेर सारी गणेश प्रतिमाओं, तंबोला तथा 'संगीत निशा' तक सिमटकर रह गया।त्योहार हमारे मन के उल्लास का प्रतीक हैं और आज भौतिकता के पीछे भागती दुनिया में तो इनकी जरूरत हमें एक-दूसरे से जोड़ने के लिए और भी बढ़ जाती है, लेकिन हम इन्हें मात्र मनोरंजन और दिखावे में बदल चुके हैं। कॉलोनी के चार कोनों में जब बच्चों का हर 'ग्रुप' अलग-अलग गणेशजी बैठाने की जिद पर अड़ता है तो बाजार में एक गणेश प्रतिमा कम होती है लेकिन भविष्य के मन में होड़ और दिखावे के कई सारे मंत्र बैठ जाते हैं और ये मंत्र दिलों में दूरियाँ बढ़ाने का काम करते रहते हैं। साँझा चूल्हा या चौपाल जैसे सुख पहले ही हमसे दूर होते जा रहे हैं। त्योहारों पर एकजुट हो, ढेर सारा आंनद पाने का समय अब हमारे पास कम होता जा रहा है। क्या हमें अब भी कॉलोनी में चार अलग गणेश उत्सवों के आयोजन की कामना है?
Subscribe to:
Comments (Atom)