Thursday, April 23, 2009

विकास के मुद्दे पर दें मत

विकास के मुद्दे पर दें मत इस बार चुनाव में देशवासियों को विकास के मुद्दे पर ही विचार कर वोट डालने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। लोगों को जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर राष्ट्र और उसके विकास के बारे में विचारशील होने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसके लिए प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सराहनीय योगदान है। आज भी पश्चिम बंगाल व उड़ीसा में एक तबका गरीबी रेखा के ऊपर नहीं उठ सका है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में खेतिहर मजदूर संगीनों के साये में खेती करते है। उड़ीसा में नालकों की खानों पर माओवादियों व छत्तीसगढ़ में राजनेताओं और पुलिस पर हमले करना सरकार के प्रति आक्रोश दर्शाता है। देश की भ्रष्ट व कुव्यवस्था के कारण कुछ लोग आतंक का रास्ता अपनाने को मजबूर है। इसलिए आजादी के 60 साल बाद ही सही मीडिया के सहयोग से आम आदमी विकास के मुद्दे पर वोट करेगा तो राजनीतिक दलों को भी विकास की भाषा समझ में आने लगेगी और आम आदमी का उत्थान होगा। वी.के. शर्मा, पीतमपुरा, नई दिल्ली धर्म की राजनीति देश को स्वतंत्र हुए साठ साल से अधिक का वक्त हो गया लेकिन विडंबना है कि इतने बड़े लोकतंत्र में आज भी धर्म की राजनीति की जा रही है। उत्तेजित एवं भड़काऊ भाषण देकर जनता को गुमराह किया जाता है। जनता बाद में झूठे जनप्रतिनिधियों का असली चेहरा समझ पाती है। भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है, जहां सभी धर्मो के लोग भाईचारे के साथ रहते हैं। स्वार्थी जनप्रतिनिधि वोटों की खातिर धार्मिक उन्माद फैला कर राजनीति की अंगीठी पर वोटों की रोटियां सेकते हैं। सभी राजनेता मूल मुद्दों से भटक जाते हैं। पिछले बीस साल से मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुस्लिम की राजनीति हो रही है, लेकिन विकास, रोजगार और सुरक्षा के मुद्दे गौण होते जा रहे हैं। यदि सभी अशिक्षित लोग शिक्षित हो जाएं तो सांप्रदायिक राजनीति अपने आप खत्म हो जाएगी। राजनीति में युवाओं को आगे आना चाहिए तभी देश उन्नति करेगा । अजय गुप्ता, दिल्ली चुनाव आयोग की सीमा चुनाव आयोग को देख कर लगता है कि उसकी हालत नख, दंत विहीन शेर जैसी है। जो दहाड़ तो सकता है लेकिन नेताओं पर कोई कठोर कार्रवाई नहीं कर सकता है। इसी बात का फायदा उठाकर तो सभी दल के नेता मनमानी करने पर उतारू हैं। चुनाव के अभी तक के हाल पर नजर डालें तो प्रतिदिन कोई न कोई नेता अनर्गल बयान दे रहे है। व्यक्तिगत लांछन से लेकर वोट की खातिर नेता इतने विवादस्पद बयान दे रहे हैं कि लगता नहीं है कि आचार संहिता भी है। आयोग के पास शिकायतों का अंबार है। शिकायत करने वाले भी किसी न किसी दल के हैं और खुद इस कृत्य में शामिल हैं। आयोग भी अपनी साम‌र्थ्य के अनुसार कार्रवाई करके किसी तरह चुनावी यज्ञ पूरा कर देना चाहता है। अब सवाल उठता है कि चुनाव आयोग द्वारा नेताओं पर कोई ठोस कार्रवाई करने के लिए क्या कभी कोई ठोस कानून बनेगा। एक बात तो साफ लग रही है कि चुनाव आयोग नेताओं पर कोई कार्रवाई करेगा सिर्फ दहाड़ने वाला शेर रहेगा। युधिष्ठिर लाल कक्कड़, गुड़गांव राजनाथ का दृष्टिकोण लोकसभा चुनाव को लेकर सभी दल एक-दूसरे पर कटाक्ष करते नजर आ रहे हैं। सोनिया गांधी ने लालकृष्ण आडवाणी की आलोचना करते हुए कहा कि वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निर्देश पर चलते हैं। उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं होगा कि इस बयान से आडवाणी और भाजपा की सहर्ष स्वीकार्यता में कई गुना वृद्धि होगी। संघ की अनुशासन और सामाजिक समरसता का अनुपालन बहुत लोग करना चाहते है। कांग्रेस में तत्वनिष्ठा नाम की कोई चीज है ही नहीं वह पूरी तरह व्यक्ति निष्ठ है। इस आरोप से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा था कि भाजपा ने संघ से मार्गदर्शन न कभी लिया और न लेगा। उन्हें संघ के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करके समाज में व्याप्त भ्रम को दूर कर अपने वक्तव्य का खंडन करना होगा। डा. बलराम मिश्र, गाजियाबाद जाति-पाति से ऊपर उठे चुनावी हलचल समुद्र की लहरों की तरह बढ़ती ही जा रही हैं। आज का चुनाव वास्तव में पूरी तरह जातिवाद पर आधारित चुनाव लग रहा है। मुस्लिम बहुल इलाके से उसी जाति विशेष को टिकट दिया जाता है और जाट बहुल इलाके से उसी जाति के व्यक्ति को टिकट दिया जाता है। जनता भी स्वजाति प्रेम के कारण समझ नहीं पाती कि कौन दागी है या कोई उम्मीदवार सही है। जनता को चाहिए कि जाति पाति की भावना से ऊपर उठकर सुयोग्य उम्मीदवार को वोट दे। संजीव वर्मा, दिल्ली गिरेबान में झांकें टीवी के माध्यम से एक प्रतिष्ठित चैनल के द्वारा प्रसारित प्रोग्राम कौन बनेगा प्रधानमंत्री प्रोग्राम को बंद कर देना चाहिए। चंद लोग ऐसे प्रोग्राम को पूर्व नियोजित कर ऐसे निष्पक्ष प्रोग्राम को सफल होने से पहले ही निष्कर्ष कर वाह-वाही लूटते हैं। अगर देखा जाए तो हम नोट के बदले वोट की जगह इस्तेमाल होकर देश की बागडोर ऐसे स्वार्थी तत्वों के हाथों में दे देते हैं जो सपेरे की तरह बीन बजा कर हमें नचाते हैं और हम नाचते रहते हैं। इसलिए हमें अपने गिरेबान में झांकना होगा --------------पंकज तिवारी "सहज"

अमृत की बूँद

अमृत की बूंद मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसी समय से अमृत की एक बूंद पाने के लिए इस संपूर्ण संसार रूपी सागर में गोते लगाने लगता है, क्योंकि यह बूंद शाश्वत एवं अनश्वर है। इस नश्वर संसार में जो आनंद प्राप्ति का लक्ष्य है वह उन्हीं धुंधले बादलों के समान है जो अपनी छाया के माध्यम से भव को प्रकाशित करने वाले भाष्कर को ढक लेते हैं। सूर्य अपने स्थान पर है, किंतु भौतिकता के बादल उन्हें ढक लेते हैं। मनुष्य भी अज्ञानता रूपी बादलों के बीच खोया है। वह संसार के भोग में निरत होकर दिशाविहीन हो जाता है। इसी मोह रूपी संसार में अनिश्चित लक्ष्य के लिए इधर-उधर दौड़ने लगता है, लेकिन जीवन निरर्थक (अर्थहीन) हो जाता है। इस पर विज्ञान ने अपनी प्रगति के माध्यम से भूत, भविष्य और वर्तमान (त्रिकालज्ञ) बनने की चेष्टा की है तथा कुछ ऐसे भी कार्य संपन्न किए हैं जो प्रकृति के विपरीत हैं। हम प्रकृति से विपरीत दिशा में बढ़ते हुए अपने आपको प्रगति की दिशा में रखे हैं। यह सांसारिक ज्ञान उस मार्गदर्शक के समान है जो हमें वास्तविकता में अपनी दिशा की ओर खींचकर दिशाहीन कर देता है। ऐसे में हमारे पास जीने के लिए मात्र लौकिक साधन ही बचते हैं और व्यक्ति उस अमृतरूपी बूंद की तलाश में अपने सारे उद्यम करता है और इसी आशा में हमेशा ही तल्लीन होकर पुरुषार्थ करता है। यह जीवन तब तक अज्ञानता और आडंबर की चादर है, जब तक उसे ज्ञान रूपी अमृत की बूंद नहीं मिलती है। आनंदरूपी अमृत की एक बूंद के बिना कल्पित पंचकोश (अन्नमय, प्राणमय, ज्ञानमय, विज्ञानमय, आनंदमय) तथा पंचजन्य (गंधर्व, देव, पितर, राक्षस, असुर) सभी शून्य हैं। बिना आनंद के हमारी सभी योजनाएं समस्त कार्य व्यवहार अतीव दुर्गम हैं। ईश्वर की शक्ति उसी आनंद से है। यह आनंद की अमृतमयी एक बूंद उस महासागर के समान है जिस समुद्र में यह जीव रूपी मछली उस रस का पान करती है। इस बूंद का पान करना उस गूंगे व्यक्ति के समान है जो अनेक व्यंजनों का भोग करके भी उस स्वाद के बारे में नहीं बता सकता। इस अमृत बूंद के बिना जीवन निष्प्राण है। इसे प्राप्त करने के लिए ज्ञानी जन अनेक स्थानों में खोज करने के बाद अपनी आत्मा में खोजता है और उसे पाकर आत्मसंतोष, आत्मनिधि के साथ प्राप्त होता है। -------- पंकज कुमार तिवारी   

परमात्मा की मित्रता

परमात्मा की मित्रता :------------------------------------------------------------------------ओउम् विष्णो: कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि परस्पशे। इन्द्रस्य युज्य: सखा।
अर्थात् उस सर्वव्यापक सर्वेश्वर भगवान की सृष्टि रचना, पालन व विविध कर्मो को देखो, जिससे जीव ज्ञान प्राप्त करता है वह परमात्मा जीवात्मा का सदा मित्र है। ऋग्वेद की यह ऋचा स्पष्ट प्रकट करती है कि ईश्वर हमारा सच्चा मित्र है, परम मित्र है। मानव एक सामाजिक प्राणी है इस नाते समाज के ही प्राणी उसके मित्र होते हैं। आशय ये नहीं कि सांसारिक मित्र सच्चे नहीं होते। वह सच्चे होते हैं किन्तु सिर्फ विरले। वह सच्चे विरले मित्र भी स्थिति परिस्थितियों के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं या बदल सकते हैं। वह अपनी सीमित शक्ति साधना से मददगार भी हो सकते हैं, किन्तु हर क्षण ईश्वर की तरह साथ नहीं रह सकते। भौतिक मित्र जो सच्चे होते हैं वह कुपथ पर जाने से रोकते हैं। बुराइयों को दूर कर अच्छाइयों की ओर ले जाते हैं। यह सत्य है, किन्तु कई बार वह पारिवारिक अथवा भौतिक विवशताओं में विवश हो जाते हैं। किन्तु यदि हमने ईश्वर को अपना मित्र मान लिया है तो वह हर क्षण हमारे साथ हैं। यह अहसास हर पल हमारे मन में जाग्रत रहेगा। यदि हम असत्य का साथ देना भी चाहेंगे तो सखा रूप में परमेश्वर हमें अवश्य रोकेंगे। ईश्वर सर्वश्रेष्ठ है, सर्वशक्तिमान है, उसकी मित्रता वाले मानव को भय नहीं हो सकता। ईश्वर से श्रेष्ठ कोई नहीं, अत: हमें ईश्वर से मित्रता करनी चाहिये। ईश्वर स्वार्थ रहित सबसे प्रेम करते हैं। अपने मित्र के सच्चे साथी होते हैं। ईश्वर के लिए असंभव कुछ भी नहीं, अपने मित्र के लिए सर्वस्व प्रदाता हैं। अधर्मी को वह अपना मित्र कदापि नहीं मानेंगे। अर्जुन धर्मशील थे, भावुक थे। ईश्वर ने उन्हें अपना मित्र माना। सिर्फ विश्वरूप के दर्शन ही नहीं कराये वरन् युद्ध में भी उनके सारथी बने। सच्चे मित्र की तरह कर्मयोग की सलाह दी। मानव ईश्वर से मित्रता कर देव बन सकता है। ईश्वर को मित्र मानकर उनकी उंगली थाम इस भवसागर से आसानी से पार उतरा जा सकता है। वह सबका कल्याण करते हैं। ऋग्वेद में लिखा है- देवो देवानाम् भव: शिव: सखा। अर्थात परमात्मा परमात्म भक्तों का कल्याणकारी मित्र होता है। हम उनसे पुन: पुन:श्च कह त्वमेव माता पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वमम् देव देव: हम सभी को परमात्मा को अपना मित्र अवश्य बनाना चाहिए।------------------------पंकज तिवारी सहज

Thursday, April 2, 2009

नवरात्री पर विशेष

-----:माँ दुर्गा के है नौ रूप:-----


नवरात्री में दो शब्द है -"नव" और "रात्रि" । "नव" शब्द संख्या वाचक है और "रात्रि"का अर्थ है -रात,समूह का काल विशेष । इस नवरात्री शब्द में संख्या और काल का मिश्रण है। विशेष रूप से दो नवरात्री प्रचलित है ,पहला नवरात्री चैत्र मास की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से और दूसरा नवरात्री क्वार मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होता है । प्राचीन समय में कुलचार नवरात्र मनाये जाते थे ,परन्तु अब दो नवरात्र ही प्रचलित रह गए है .शक्ति उपासना के लिए नवरात्री सर्वाधिक उपयुक्त मन जाता है । नवरात्री शक्ति पूजा का समय है। शक्ति ही वास्तव में किसी भी वास्तु के स्वरुप को स्थिर करने में समर्थ है। बिना शक्ति के कोई भी वास्तु क्षण भर भी हो नही सकती। हर व्यक्ति को यदि अपने स्वरूप की रक्षा करनी है ,उसे शक्ति संपादन अवश्य ही करना चाहिए । इसमे कोई संदेह नही कि सब के मूल शक्ति की अंशभूत एक-एक अलग शक्ति काम करती रह्ती है,इसलिए हम किसी शक्ति की उपेक्षा नही कर सकते । इस विषय में में कवि रहीमदास जी कहते है कि-------------रहिमन देखि बडन को लघु न दीजिए डारि जहा काम आवै सूई कहा करै तरवारी


शक्ति का स्वरुप वर्णन नही हो सकता ,वह सबके भीतर कार्य करती है । शक्ति वस्तु के भीतर रहने वाला वह धर्म है ,जिससे स्वरुप का लाभ प्राप्त करती है तथा स्वरुप कीरक्षा करती है । शास्त्रों में इसको बड़े ही उत्तम ढंग से समझाया गया है कि इस शक्ति का शक्तिमान के साथ तादात्मय सम्बन्ध है। इसका अर्थ है कि जो पदार्थ किसी अन्य पदार्थ से अलग भी लगता हो और अलग नही भी हो तब उसका उस पदार्थ के साथ तादात्म्य सम्बन्ध मन जाता है । इसका एक अच्छा उदहारण है जैसे :------दीपक और उसका प्रकाश । प्रकाश दीपक से अलग भी है और नही भी है । यह दो बाते अलग इसलिए है कि दीपक को प्रकाश और प्रकाश को दीपक न तो कहा जा सकता है और न ही समझा जा सकता है । कारण यदि दीपक कि लौ पर हम अपना हाथ रख दे तो जल जाएगा ,परन्तु प्रकाश में एसी कोई बात नही है । अतः सिद्ध होता है कि ये दोनों अलग है परन्तु यदि दीपक को हटा दे तो प्रकाश अपने आप हट जाएगा ,तब इसे अलग नही समझा जा सकता है । इसी तरह से सभी पदार्थो में शक्ति है । "तस्य सर्वस्य या शक्तिः "जिसका अर्थ है कि शक्ति और वास्तविक शक्ति ,जिसकी हम प्रार्थना करते है । वह सबकी है ,किसी एक कि नही है .प्रत्येक में उसका अंश है । इसलिए दुर्गा सप्तसती में भी शक्ति का निवास एक व्यक्ति या एक स्थान पर नही कहा गया है । योगनिद्रा में कहा गया है कि :------नेत्रस्य्मासिक बहुद्येभ्य्स्थोरासह ।


निर्गम्य दर्शाने तस्यो ब्रम्ह्नोस्व्यक्त्जन्य्मयाह । ।


अर्थ:---इसका अर्थ यह है कि शक्ति नेत्र ,मुख,नासिका,ह्रदय,और छाती से निकल कर दृष्टिगोचर हुई। शक्ति कही भी केवल एक ही स्थान पर नही रह्ती । वह अलग- अलग स्थानों पर विभाजित होकर सुशुप्त रह्ती है ,परन्तु सबका सहयोग होने पर कार्य कराने लगती है ।


नवरात्री के नौ दिनों में भगवती दुर्गा कि अलग-अलग तीन शक्तियों कि तीन नामो से कि जाती है प्रथम तीन दिन लक्ष्मी ,दुसरे तीन दिन सरस्वती और अन्तिम तीन दिन कलि रूप कि आराधना कि जाती है । इसीलिए दुर्गा सप्तसती में तीन बार "नमस्तस्ये " का यही अभिप्राय है कि भक्त तीनो शक्तियों को प्रणाम कर रहा है । कुछ उपासक महाकाली के १० भुजाओ वाली संहारक शक्ति कि पूजा करते है ,कुछ १८ भुजाओ वाली महालक्ष्मी के रूप में प्रतिपालक शक्ति कि पूजा करते है और कुछ ८ भुजाओ वाली महासरस्वती के रूप में उद्बोधक शक्ति के रूप में पूजा करते है। दुर्गा सप्तसती के तीनो भागो कि ये देविया अधिष्ठात्री शक्ति मणि गयी है। विस्तार से समझने हेतु भगवती दुर्गा के नौ रूपों में प्रथम शैलपुत्री ,द्वितीय ब्रम्ह्चारिणी ,तृतीय चंद्रघंटा ,चतुर्थ कुष्मांडा ,पंचम स्कंदमाता,छठा कात्यायिनी,सप्तम कालरात्रि ,अष्टम महागौरी .नवं सिद्धिदात्री है । नवदुर्गा कि प्रतिरूप नौ शक्तिया है। करके,उसे ,हम,वैष्णवी,वाराही,नारसिंही,इंद्री,शची और चामुंडा । यदि मानव माँ भगवती को सच्चे अर्थो में प्रसन्न करना चाहता है तो समस्त बुराइयों का बलिदान करके उसे माँ को प्रसन्न करना चाहिए। जिस प्रकार सौम्य रूप में शंकर ,शिव के नाम से तथा भयंकर रूप में रुद्र के नाम से प्रसिद्द है उसी प्रकार से देवी अपने सौम्य रूप में भगवती गौरी के रूप में तथा भयंकर रूप में माँ दुर्गा काली या चंडी के नाम से विख्यात है । सभी को शुभ शक्ति प्राप्त हो ऐसी हमारी माँ भगवती से सदैव प्रार्थना है:--------या देवी सर्व भूतेश शक्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमो नमः ।।

------: पंकज तिवारी सहज :------






आखिर बदला गाँव (कविता)

कहा गए स्नेह व रिश्ते ,गयी कहा गाँव की रीति ।
चलता नही हल किसान गाँव में ,दिखे न राह बटोही ।
चले न समय से पछवा पुरवैया ,पवन हुआ निर्मोही ।।
वर्षा ऋतू में चले लूक जैसे बदल गयी है निति।
कहा गए स्नेह व रिश्ते ,गयी कहा गाँव की रीति।।
किसी बैग में मिले न मानुष करता वन रखवाली ।
दिखे न गाँव में हाथीघोडे गाँव के मुखिया दुवारी ।।
चारो तरफ़ दबंगई नेता ,आंख दिखा करते राजनीती ।
कहा गए स्नेह व रिश्ते ,गयी कहा गाँव की रीति ।।
भइया गए बम्बई कमाने ,टेलीफोन न भेजे पाती ।
गावे माई रोवे फूटी-फूटी ,बात न चितवा लुभाती ।।
रिश्ते की डोरी टूट गयी क्या कहा गयी एक की दूजे प्रीति।
कहा गए स्नेह व रिश्ते ,गयी कहा गाँव की रीति ।।
वृक्ष कर हे मानुष ,करता क्यों प्रकृति लडाई ।
आज है चाहत पानी की तो पछवा चले बयारी ।।
मानुष करते तंग प्रकृति को ,प्रकृति भुलाई भीती ।
कहा गए स्नेह व रिश्ते ,गयी कहा गाँव की रीति ।।
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------------पंकज तिवारी सहज "संतोष"----------
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Wednesday, April 1, 2009

यह कैसा न्याय ?

आखिर वरुण गाँधी का कसूर या अपराध क्या था ?जो निर्वाचन आयोग ने उनके खिलाफ इतना सक्रियहो गया पता नही कितने ऐसे लोग है जिनके खिलाफ आयोग के कानो पर जू तक नही रेंगती । आयोग के अलावा मायावती सरकार ने वरुण गाँधी के खिलाफ इतनी तत्परता दिखाते हुए उनके ऊपर रास्ट्रीय सुरक्षा कानून (रा.सु.का।) लगा दिया इतना बड़ा अपराध तो वरुण गाँधी ने नही किया था किउनके खिलाफ रासुका लगाया जाए । माया सरकार में पता नही कितने अपराधी प्रवृति के लोग है जिनके हाथ में सत्ता कि बागडोर है ,जो कल अपराधी थे वे आज सांसद और विधायक बन कर हमारे यहाँ कानून का निर्माण कर रहे है जिनको कल तक पुलिस खोज रही थी उन्हें आज पुलिस सुरक्षा प्रदान कर रही है ,अर्थात जिनके ऊपर रासुका लगना चाहिए वे आज शासन चला रहे है और जिनको शासन चलाना चाहिए वे जेल जा रहे । वह रे चुनाव आयोग और माया सरकार ।
आखिर वरुण गाँधी ने क्या कहा था वे सिर्फ़ हिन्दुओ की दीनदशा देखकर उनमे सिर्फ़ साहस भरने तथा उन्हें एहसास दिलाने का सिर्फ़ प्रयास किया था की वे (हिंदू) अकेले नही है बल्कि उनके साथ एक युवा गाँधी परिवार का वंसज हिंदुत्व पर स्वाभिमान ह्रदय में धारण किए हुए उनके(हिन्दुओ) के साथ खड़ा है।
वरुण गाँधी के प्रति भारतीय सेकुलर सत्ता का जो व्यवहार रहा है वह उसके अंतर्मन के हिंदुद्वेषी चरित्र को उद्घाटित करता है ,जो निर्वाचन आयोग शहाबुद्दीन,लालू यादव,आजम खान ,शिबू शोरेन ,मुख्तार अंसारी,आदि जैसे तमाम आरोपियों तथा जाती विशेष के विरुद्ध विषवमन करने वाले लोगो के बारे में कभी इतना सक्रिय नही हुआ आखिर वरुण गाँधी से उसको इतना घृणा क्यो हो गई ?क्या चुनाव आयोग को यह नही दिखता की कोयम्बतूर बम धमाके का मुख्य आरोपी मदनी न सिर्फ़ जेल में रह चुनाव लड़ा बल्कि आज वह केरल की चुनावी राजनीती का सञ्चालन करता भी है । फारुख अब्दुल्ला ने सार्वजनिक बयान दिया था की अगर अफजल को फांसी दी गयी तो सरे मुल्क में आग लग जायेगी ,अंतुले रहमान ने तो कसाब के मामले में हमारे भारतीय शहीदों का अपमान किया ,पाकिस्तानी भाषा बोली न तो उनसे मंत्री पड़ वापस लिया गया और न ही उस समय चुनाव आयोग ने कुछ बोला और आज वाही अंतुले चुनाव लड़ रहे है । क्या उस समय राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी बढेरा की कांग्रेस ने गीता और बाइबिल नही पढ़ी थी और नही अपने राजधर्म का किसी भारतीय विद्वान् से ज्ञान प्राप्त किया ।
केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने बाटला हाउस प्रकरण में शहीद मोहन चन्द्र शर्मा का अपमान कर आतंकियों के अदालती खर्च के लिए पैसा देने वाले उपकुलपति का समर्थन किया और उन्ही अर्जुन सिंह को बाद में देश के अन्य उपकुलपति चुनने वाली समिति का संयोजक बना दिया गया । वाह रे भारतीय न्याय प्रक्रिया -एसे सेकुलरों और उसी की रंग में रंगे चुनाव आयोग ने वरुण गाँधी के बारे में भाजपा को यह सलाह देने की जरुरत समझी की पार्टी वरुण गाँधी को टिकट न दे -हमारे चुनाव आयोग से और मायावती सरकार से कोई पूछने वाला नही है की अगर सुखराम,लालू प्रसाद,मुख्तार अंसारी ,शिबूसोरें,साधू यादव,अमरमणि त्रिपाठी ,राजा भइया ,धनंजय सिंह,उमाकांत,आदि अगर चुनाव लड़ सकते है तो वरुण गाँधी क्यों नही ?
वरुण गाँधी ही नेहरू खानदान में ऐसे पहले व्यक्ति हुए है जिन्होंने हिंदू धर्म के प्रति अपने स्वाभिमान को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया है । अभी तक भारतीय राजनीती में गाँधी-नेहरू परिवार हिंदुत्व के समर्थको पर कटु आघात करने के लिए जन जाता है । पंडित नेहरू संघ के कट्टर विरोधी थे परन्तु उन्ही नेहरू के प्रपौत्र वरुण गाँधी ने आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा के साथ खुलकर खड़े है ,तो यह हिंदुत्व समर्थको के लिए भारतीय राजनीती में एक मील का पत्थर माना जाना चाहिए । वरुण गाँधी के सामान ही गाँधी-नेहरू वंशज के उत्तराधिकारी है राहुल गाँधी ,क्या कोई राहुल से यह अपेक्षा कर सकता है की वह हिंदू धर्म ,सभ्यता एवं समर्थन में एक शब्द भी कह सकते है ? मूल बात तो यह है की उन्हें हिंदू धर्म और संस्कृति की जानकारी होगी इसमे भी संदेह है ।
इस प्रकार द्वेष बस और वरुण को बदनाम कराने के लिए चुनाव आयोग और माया सरकार मिल कर वरुण गाँधी पर रासुका लगा दिया यह कितना बड़ा अन्याय है की मूल सीडी भी वरुण गाँधी को आन्ही दिखाई गयी जिसके आधार पर उन पर रासुका लगा अरे कम से कम उनकों सफाई देने के लिए समय तो देना चाहिए----------------------वाह रे चुनाव आयोग -----------------------पंकज तिवारी"सहज"