Friday, December 26, 2008

गीता



‍गीता महत्व » श्रीमद्‍भगवद्‍गीता
अर्जुनविषादयोग- नामक पहला अध्याय
01-11
दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य का कथन।
12-19
दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन
20-27
अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग
28-47
मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन

सांख्ययोग-नामक दूसरा अध्याय
01-10
अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद
11-30
सांख्ययोग का विषय
31-38
क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण
39-53
कर्मयोग का विषय
54-72
स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा

कर्मयोग- नामक तीसरा अध्याय
01-08
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण
09-16
यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण
17-24
ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
25-35
अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा
36-43
काम के निरोध का विषय

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग- नामक चौथा अध्याय
01-18
सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय
19-23
योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा
24-32
फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन
33-42
ज्ञान की महिमा

कर्मसंन्यासयोग- नामक पाँचवाँ अध्याय
01-06
सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय
07-12
सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
13-26
ज्ञानयोग का विषय
27-29
भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन

आत्मसंयमयोग- नामक छठा अध्याय
01-04
कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण
05-10
आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण
11-32
विस्तार से ध्यान योग का विषय
33-36
मन के निग्रह का विषय
37-47
योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

ज्ञानविज्ञानयोग- नामक सातवाँ अध्याय
01-07
विज्ञान सहित ज्ञान का विषय
08-12
संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन
13-19
आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा
20-23
अन्य देवताओं की उपासना का विषय
24-30
भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा

अक्षरब्रह्मयोग- नामक आठवाँ अध्याय
01-07
ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर
08-22
भक्ति योग का विषय
23-28
शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय

राजविद्याराजगुह्ययोग- नामक नौवाँ अध्याय
01-06
प्रभावसहित ज्ञान का विषय
07-10
जगत की उत्पत्ति का विषय
11-15
भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का प्रकार
16-19
सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन
20-25
सकाम और निष्काम उपासना का फल
26-34
निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा

अगले नौ अध्याय
श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय
1.
अर्जुनविषादयोग
2.
सांख्ययोग
3.
कर्मयोग
4.
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
5.
कर्मसंन्यासयोग
6.
आत्मसंयमयोग
7.
ज्ञानविज्ञानयोग
8.
अक्षरब्रह्मयोग
9.
राजविद्याराजगुह्ययोग
10.
विभूतियोग
11.
विश्वरूपदर्शनयोग
12.
भक्तियोग
13.
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
14.
गुणत्रयविभागयोग
15.
पुरुषोत्तमयोग
16.
दैवासुरसम्पद्विभागयोग
17.
श्रद्धात्रयविभागयोग
18.
मोक्षसंन्यासयोग

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता



‍गीता महत्व » श्रीमद्‍भगवद्‍गीता
अर्जुनविषादयोग- नामक पहला अध्याय
01-11
दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणना और सामर्थ्य का कथन।
12-19
दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन
20-27
अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग
28-47
मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन

सांख्ययोग-नामक दूसरा अध्याय
01-10
अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद
11-30
सांख्ययोग का विषय
31-38
क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण
39-53
कर्मयोग का विषय
54-72
स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा

कर्मयोग- नामक तीसरा अध्याय
01-08
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण
09-16
यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण
17-24
ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता
25-35
अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा
36-43
काम के निरोध का विषय

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग- नामक चौथा अध्याय
01-18
सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय
19-23
योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा
24-32
फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन
33-42
ज्ञान की महिमा

कर्मसंन्यासयोग- नामक पाँचवाँ अध्याय
01-06
सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय
07-12
सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा
13-26
ज्ञानयोग का विषय
27-29
भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन

आत्मसंयमयोग- नामक छठा अध्याय
01-04
कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण
05-10
आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण
11-32
विस्तार से ध्यान योग का विषय
33-36
मन के निग्रह का विषय
37-47
योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा

ज्ञानविज्ञानयोग- नामक सातवाँ अध्याय
01-07
विज्ञान सहित ज्ञान का विषय
08-12
संपूर्ण पदार्थों में कारण रूप से भगवान की व्यापकता का कथन
13-19
आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा
20-23
अन्य देवताओं की उपासना का विषय
24-30
भगवान के प्रभाव और स्वरूप को न जानने वालों की निंदा और जानने वालों की महिमा

अक्षरब्रह्मयोग- नामक आठवाँ अध्याय
01-07
ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर
08-22
भक्ति योग का विषय
23-28
शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय

राजविद्याराजगुह्ययोग- नामक नौवाँ अध्याय
01-06
प्रभावसहित ज्ञान का विषय
07-10
जगत की उत्पत्ति का विषय
11-15
भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का प्रकार
16-19
सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन
20-25
सकाम और निष्काम उपासना का फल
26-34
निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा

अगले नौ अध्याय
श्रीमद्भगवद् गीता अध्याय
1.
अर्जुनविषादयोग
2.
सांख्ययोग
3.
कर्मयोग
4.
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
5.
कर्मसंन्यासयोग
6.
आत्मसंयमयोग
7.
ज्ञानविज्ञानयोग
8.
अक्षरब्रह्मयोग
9.
राजविद्याराजगुह्ययोग
10.
विभूतियोग
11.
विश्वरूपदर्शनयोग
12.
भक्तियोग
13.
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
14.
गुणत्रयविभागयोग
15.
पुरुषोत्तमयोग
16.
दैवासुरसम्पद्विभागयोग
17.
श्रद्धात्रयविभागयोग
18.
मोक्षसंन्यासयोग -------------------------
-----------------------------पंकज तिवारी सहज

श्रीमद्भागवदगीता

श्रीमद्भागवदगीता


कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बच्चों को अर्थ और भाव के साथ श्रीगीताजी का अध्ययन कराएँ। स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए भगवान की आज्ञानुसार साधन करने में समर्थ हो जाएँ क्योंकि अतिदुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी दु:खमूलक क्षणभंगुर भोगों के भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है।गीताजी का पाठ आरंभ करने से पूर्व निम्न श्लोक को भावार्थ सहित पढ़कर श्रीहरिविष्णु का ध्यान करें--अथ ध्यानम्शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भावार्थ : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता
हूँ।यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।
भावार्थ : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।
श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का पाठ करें